
Gujarat Hindi News : आणंद का पतंग उद्योग 4000 महिलाओं को दे रहा है रोजगार
बुरहान पठाण
आणंद. आणंद जिले के ऐतिहासिक शहर खंभात का खंभाती पतंग पतंगबाजों के बीच वर्षों से विशेष पहचान स्थापित कर चुका है। पतंग के शौकिनों के लिए खंभाती पतंगों का विशेष महत्व है। कोरोना महामारी के कारण पिछले वर्ष यहां का पतंग कारोबार आधा तक सिमट गया था, लेकिन इस साल कुछ हालात सुधरने की उम्मीद में यह 30 फीसदी बढ़कर 80 फीसदी तक जा पहुंचा है।
अपनी खासियतों की वजह से खंभाती पतंग का बाजार राज्य के जिलों से बढ़कर देश-विदेश के स्तर पर पहुंच चुका है। वहीं खास बात यह है कि खंभात में करीब 12 हजार से अधिक परिवार पतंग उद्योग से जुड़े हैं। करीब सात हजार पतंग कारीगर पतंग बनाते हैं। इनमें चार हजार महिलाएं हैं, जो पतंग बनाने में दिन-रात जुटी रहती हैं। पतंग उद्योग के कारण यह महिलाएं स्वावलंबी होकर अपने परिवार का जीवन निर्वाह करने में भूमिका अदा करती हैं। पतंग उद्योग के साथ हरेक धर्म और समाज के लोग जुड़े होते हैं। व्यापार की प्रगति के साथ सामाजिक एकता से चारों ओर सदभावना प्रकट होती प्रतीत होती है।
पांच करोड़ पतंग के निर्माण से 50 करोड़ रुपए का टर्नओवर
गुजरात के सौराष्ट्र, अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत, वापी, वलसाड, भरुच समेत शहरों में खंभाती पतंगों की खूब मांग रहती है। इसकी खास वजह इसमें इस्तेमाल होने वाला जिलेटिन कागज होता है जो आकर्षक और हवा में उड़ाने में काफी मददगार माना जाता है। बांस की फिनिशिंग उत्कृष्ट होने से पतंग आकाश में बादलों को छूने में जोर लगाता है। यही वजह है कि यहां के पतंगों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। खंभात के उत्पादक पांच करोड़ से अधिक पतंग का होलसेल और रिटेल व्यापार करते है। इस साल आठ करोड़ से अधिक पतंग बनाया गया है, जिससे खंभात में करीब 50 करोड़ रुपए का टर्नओवर होगा। राज्य भर से रोजाना औसत आठ से 12 हजार पतंग के शौकिन और व्यापारी पतंग खरीदने आणंद व खंभात पहुंचते हैं।
मुगलकालीन जमाने से चल रही पतंगबाजी
अंग्रेजों और मुगलकालीन साम्राज्य में भी खंभात के पतंगों का बोलबाला माना जाता था। पीढ़ी दर पीढी पतंगों के कारीगर पतंग बनाने की इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस साल पतंग का चील, गेंसिया, कनकवा आदि का उत्पादन किया गया है। खंभात के प्रसिद्ध पतंगों के बाजार में मांग बढऩे के कारण महिलाओं के अलावा युवक भी पतंग निर्माण के रोजगार के प्रति आकर्षित हुए हैं। हाल खंभात में 7 हजार से अधिक पतंग के कारीगर हैं। इनमें से चार हजार से अधिक सिर्फ महिलाएं हैं। खंभात में घर-घर पतंग बनाना एक कुटीर उद्योग की तरह स्थापित हो चुका है। पतंग का निर्माण सात चरणों से होकर गुजरता है। सबसे पहले कागज की कटिंग, कमान, ढढो, किनारा, पूंछ, पाटा, डिजाइन आदि अलग-अलग कारीगरों के हाथ से गुजरता हुए एक सम्पूर्ण पतंग का निर्माण होता है।
महामारी के असर से निराश विक्रेता
पतंग उत्पादकों का कहना है कि इस बार पतंग उद्योग पर महंगाई और मंदी की दोहरी मार पड़ी है। इस बार सीजन में सौराष्ट्र के व्यापारी नहीं पहुंचे हैं। वहीं सूरत, बीलीमोरा आदि जगहों से भी अपेक्षा के मुताबिक व्यापारी नहीं आए हैं। गत वर्ष सौ पतंग का भाव 400 रुपए था, इस साल इनका भाव 450 से 500 रुपए है। कारीगरों का मेहनताना 120 रुपए से बढ़ाकर 200 रुपए हो गया है। पिछले साल उन्होंने चार लाख पतंग का उत्पादन किया था, इस बार संख्या घटाकर एक लाख किया है।
पतंग उत्पादक खंभात के रमेश चंद्र चुनारा कहतेे हैं कि खंभात के बाजार में दो इंच का पतंग भी बनाया जाता है। यह पतंग घर की सजावट, भेंट-उपहार आदि में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा आठ फीट का चंदरवा, रॉकेट आदि पतंग की मांग बढ़ी है। इन पतंगो की कीमत 500 रुपए से लेकर 2000 तक होती है। प्राचीन नगरी खंभात में नवाबों के समय से परंपरागत रूप से उत्तरायण का पर्व मनाया जाता है। एक अनुमान के अनुसार महज सूरत में खंभात का 70 लाख से अधिक पतंग की बिक्री होती है। मकर संक्रांति तक यह आंकड़ा एक करोड़ तक पहुंच जाता है।
उत्तरायण के पहले पतंग खरीदने खंभात पहुंचे सूरत के निवासी अरविंदभाई मीठापरा ने कहा कि खंभात का पतंग मनमोहक, कलात्मक होता है। पिछले 20 वर्षों से वे परिवार व मित्रों के साथ खंभाती पतंग खरीदने आते हैं। खंभाती पतंग उड़ाने में सरल और दिखने में सुंदर होते हैं, इसी आकर्षण से वह हर साल खंभात तक खींचे चले आते हैं। पतंग उत्पादक अंकित राजपूत ने कहा कि खंभात मतें कोलकाता से कमान मंगाया जाता है। पिछले साल एक हजार कमानी का भाव 450 रुपए था जो इस साल बढ़कर 550 हो गयाा है।
Published on:
03 Jan 2022 12:26 pm
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