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…यहां गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं, वीसा यंत्र की पूजा करते हैं पुजारी

अंबाजी मंदिर: 51 शक्तिपीठों में शामिल

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...यहां गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं, वीसा यंत्र की पूजा करते हैं पुजारी

...यहां गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं, वीसा यंत्र की पूजा करते हैं पुजारी

राजेंद्र धारीवाल

पालनपुर. गुजरात में बनासकांठा जिले के अंबाजी में अंबाजी माता का मंदिर है। 358 स्वर्ण कलश वाला यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। अरावली की पर्वत श्रृंखला में स्थित अंबाजी माता मंदिर में मूर्ति नहीं है।

मंदिर में दीवार पर शुद्ध स्वर्णजड़ित वीसा यंत्र संगमरगर की तख्ती पर लगा है। यह वीसा यंत्र उज्जैन और नेपाल के शक्तिपीठ केे मूल यंत्र से जुड़ा होने की मान्यता है। वीसा यंत्र में 51 अक्षर होने का प्रमाण है। वीसा यंत्र को मुकुट, चूंदड़ी, फूल-माला से इस प्रकार श्रृंगारित किया जाता है कि श्रद्धालुओं को सवारी पर आरूढ अंबाजी माता की मूर्ति का स्वरूप ही नजर आता है। इस यंत्र के प्रभाव से मंदिर उत्तरोत्तर रिद्धि-सिद्धि मय बन रहा है। इस यंत्र के स्थान को नजर से देखना निषेध है इसलिए मंदिर के पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर यंत्र की पूजा करते हैं। यंत्र को कल्पवृक्ष के समान माना गया है। पाटण जिले के सिद्धपुर के मानस गौत्र के ब्राह्मण डेढ़ सदी से अब तक प्रत्येक महीने की अष्टमी को वीसा यंत्र की पूजा करते हैं।

पूर्व राजवी परिवार के वंशज करते हैं पूजन

पूर्व राजवी भवानसिंह के बाद उनके पुत्र पृथ्वीराजसिंह गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल के दौरान भारत को स्वतंत्रता मिली। विलय समझौते के अनुसार दांता स्टेट का भारत संघ में विलय हो गया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से पृथ्वीराजसिंह को दांता के पूर्व राजवी परिवार के स्वामित्व वाले अंबाजी माता मंदिर का कब्जा सरकार को सौंपने के लिए कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर को कब्जे में लिया। 1963 में राज्य सरकार की ओर से श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट की स्थापना की गई। बनासकांठा के जिला कलक्टर की अध्यक्षता में ट्रस्ट की ओर से मंदिर का संचालन किया जा रहा है। आज भी दांता के पूर्व राजवी परिवार के वंशज आस्था के साथ मंदिर में अंबाजी माता का पूजन करते हैं।

अंबाजी माता का प्राकट्य

गाथा के अनुसार भगवान शिव ने सती के देह त्यागने के पश्चात शरीर को कंधे पर उठाकर तीनों लोक में भ्रमण किया। संपूर्ण सृष्टि के नष्ट हो जाने के भय से भगवान विष्णु ने अपना चक्र छोड़ा। सती के शरीर के अंग और आभूषण 51 स्थान पर गिरे। उन्हीं स्थान पर एक शक्ति और एक बटुक भैरव भैरव छोटे-छोटे रूप धारण करके विराजमान हो गए। ऐसा माना जाता है कि अंबाजी में सती का हृदय का भाग गिरा था।

सात वार के 7 स्वरूप

अंबाजी माता रविवार को बाघ पर, सोमवार को नंदी पर, मंगलवार को सिंह पर, बुधवार को ऐरावत पर, गुरुवार को गरुड़ पर, शुक्रवार को हंस पर और शनिवार को हाथी पर सवारी करते दृश्यमान होती हैं।

358 स्वर्ण कलश से सुशोभित मंदिर

वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 1975 में आरंभ हुआ। करोड़ों रुपए खर्चकर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया। मंदिर के 103 फीट ऊंचे शिखर पर 3 टन वजन का कलश रखा गया। वर्तमान में 358 स्वर्ण कलश से मंदिर सुशोभित है। यहां वर्ष में करीब 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। नवरात्रि के दौरान अंबाजी के मंदिर में अच्छी खासी भीड़ रहती है। इस साल भादरवी पूर्णिमा के मेले में 48 लाख से ज्यादा भक्तों ने दर्शन किए।

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