
अंबाजी मंदिर।
राजेंद्र धारीवाल
पालनपुर. गुजरात में बनासकांठा जिले के अंबाजी में अंबाजी माता का मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। अरावली की पर्वत श्रृंखला में स्थित अंबाजी माता मंदिर के गर्भगृह में मूर्ति नहीं है। यहां पुजारी वीसा यंत्र की पूजा करते हैं।मुकुट, चुनरी, फूल-माला से वीसा यंत्र को इस प्रकार श्रृंगारित किया जाता है कि वीसा यंत्र में श्रद्धालुओं को सवारी पर आरूढ अंबाजी माता की मूर्ति का स्वरूप नजर आता है।
इस यंत्र के स्थान को नजर से देखना निषेध है इसलिए मंदिर के पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर यंत्र की पूजा करते हैं। पाटण जिले के सिद्धपुर के मानस गौत्र के ब्राह्मण डेढ़ सदी से अब तक प्रत्येक महीने की अष्टमी को वीसा यंत्र की पूजा करते हैं। यंत्र को कल्पवृक्ष के समान माना गया है।
खेड़ब्रह्मा में था मूल स्थान
एक दंत कथा के अनुसार माताजी का मूल स्थान खेड़ब्रह्मा में था। पूर्व दांता रियासत के तत्कालीन पूर्व महाराणा माताजी के परम भक्त थे। एक बार माताजी तत्कालीन पूर्व महाराणा पर प्रसन्न हुई, इस कारण माताजी को अपने पूर्व रियासत में लाने की भावना जगी। माताजी की तरफ से संकेत हुआ कि वे आगे चलें और वे मैं पीछे-पीछे चल रही हैं। तत्कालीन पूर्व महाराणा आगे चल रहे थे और पीछे माताजी की सवारी। रास्ते में घना जंगल आने पर तत्कालीन पूर्व महाराणा ने पीछे देख लिया कि माताजी कितने दूर हैं? उसी क्षण उस स्थान पर माताजी स्थित हो गईं। तत्कालीन पूर्व महाराणा ने उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया।
1963 में ट्रस्ट की स्थापना
1963 में राज्य सरकार की ओर से श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट की स्थापना की गई। बनासकांठा के जिला कलक्टर की अध्यक्षता में ट्रस्ट की ओर से मंदिर का संचालन किया जाता है। आज भी दांता के पूर्व राजवी परिवार के वंशज आस्था के साथ मंदिर में अंबाजी माता का पूजन करते हैं।
महाराणा प्रताप ने अर्पित की अपनी तलवार
हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित होने के बाद महाराणा प्रताप ने अरवल्ली के पहाड़ों में दिन व्यतीत किए। उन्होंने पुत्रों के साथ अपनी रानी को ईडर स्थित पीहर भेजने के बाद तीन महीने पश्चात मिलने आने का वचन दिया। ईडर के चारों तरफ मुगल सैनिकों के जाब्ते के बीच रानी से मिलने जाना असंभव लगा। तीन महीने में पांच दिन ही बाकी रहे इसलिए महाराणा प्रताप ने मां अंबा से प्रार्थना की व प्रण किया कि रानी और पुत्रों से मिलकर अपनी तलवार मां अंबा के चरणों में रखूंगा। माताजी का आशीर्वाद प्राप्त होते ही महाराणा प्रताप ईडर के लिए रवाना हुए। ईडर में रानी व पुत्रों से मिलकर सकुशल पुन: लौटे। अंबाजी में आरासुरी अंबाजी मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना व आरती करने के बाद स्वयं की तलवार को मां अंबा के चरणों में अर्पित की। मंदिर में आज भी उस तलवार की पूजा होती है।
अंबाजी माता का प्राकट्य
गाथा के अनुसार भगवान शिव ने सती के देह त्यागने के पश्चात शरीर को कंधे पर उठाकर तीनों लोक में भ्रमण किया। संपूर्ण सृष्टि के नष्ट हो जाने के भय से भगवान विष्णु ने अपना चक्र छोड़ा। सती के शरीर के अंग और आभूषण 51 स्थान पर गिरे। उन्हीं स्थान पर एक शक्ति और एक बटुक भैरव भैरव छोटे-छोटे रूप धारण करके विराजमान हो गए। ऐसा माना जाता है कि अंबाजी में सती का हृदय का भाग गिरा था।
358 स्वर्ण कलश से सुशोभित मंदिर
वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 1975 में आरंभ हुआ। करोड़ों रुपए खर्चकर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया। मंदिर के 103 फीट ऊंचे शिखर पर 3 टन वजन का कलश रखा गया। वर्तमान में 358 स्वर्ण कलश से मंदिर सुशोभित है। यहां वर्ष में करीब 25 लाख से ज्यादा श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। नवरात्र के दौरान अंबाजी के मंदिर में अच्छी खासी भीड़ रहती है। इस साल भादरवी पूर्णिमा के मेले में 48 लाख से ज्यादा भक्तों ने दर्शन किए।
सात वार के 7 स्वरूप
अंबाजी माता रविवार को बाघ पर, सोमवार को नंदी पर, मंगलवार को सिंह पर, बुधवार को ऐरावत पर, गुरुवार को गरुड़ पर, शुक्रवार को हंस पर और शनिवार को हाथी पर सवारी करते दृश्यमान होती हैं।
Published on:
08 Apr 2024 10:17 pm
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