
मोरबी. राजकोट. गुजरात सरकार के मोरबी वन विभाग के तहत रामपरा वन्यजीव अभयारण्य 15.01 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और यह मोरबी जिले के वांकानेर तहसील में स्थित है। यह मोरबी शहर से 50 किलोमीटर और वांकानेर से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
मोरबी वन विभाग के उप वन संरक्षक डॉ. सुनील कुमार बेरवाल ने बताया कि इस अभयारण्य में 100 से अधिक प्रजातियों के वन्यजीव पाए जाते हैं और 20 से अधिक प्रजातियों के स्तनधारी पशु इस क्षेत्र में निवास करते हैं। इनमें तेंदुआ, लकड़बग्घा, भेड़िया, चिंकारा, नीलगाय, जंगली सूअर, सियार और खरगोश शामिल हैं।
अजगर, कोबरा (नाग), वाइपर, धामण जैसे सांपों के अलावा घो और छिपकलियों सहित 15 से अधिक प्रजातियों के सरीसृप यहां पाए जाते हैं। 10 से अधिक प्रजातियों की मकड़ियां और रंग-बिरंगी तितलियां हैं।
इस क्षेत्र में 150 से अधिक प्रजातियों के स्थानीय और प्रवासी पक्षी पाए जाते हैं। इनमें मोर, खेरखट्टो, ब्राह्मणी मैना, बुलबुल, दर्जी पक्षी, कुत्की, ससेतर, लावरी, सुगरी, तीतर, चक्करखोरा आदि शामिल हैं। छोटी सिसोटी, बतख, दूधराज, टीलावाली बतख यहां घोंसले बनाती हैं। मानसून के दौरान चातक और नववर्ण (इंडियन पिट्टा) यहां मेहमान बनकर आते हैं। शिकरा, बाज आदि शिकारी पक्षी भी हैं।
सर्दियों में कुंज, पेंण और विभिन्न प्रजातियों की बतख भी यहां आती हैं। इस अभयारण्य में एशियाई शेरों की जीन-पूल आबादी तथा चीतल, सांभर और चिंकारा के ब्रीडिंग सेंटर की महत्वपूर्ण व्यवस्था है।
डॉ. बेरवाल ने बताया कि वर्ष 2008 में रामपारा अभयारण्य को शेरों की जीन-पूल आबादी के लिए चुना गया था और वर्तमान में परियोजना के अंतर्गत 12 सिंहों के लिए 6 बड़े एन्क्लोजर हैं। चीतल के प्रजनन के लिए भी उनके एन्क्लोजर में छाया और भोजन की उचित व्यवस्था है। उपचार के लिए अस्पताल, पशु चिकित्सक,अटेंडेंट और पशुओं के परिवहन के लिए वाहन आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं। दैनिक भोजन तैयार करने के लिए कमरे बनाए गए हैं और निगरानी के लिए वॉच टावर है।
वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक आवास में अनावश्यक बाधा न पहुंचे और उनके प्राकृतिक व कृत्रिम संरक्षण के लिए यह अभयारण्य आम जनता के आवागमन के लिए प्रतिबंधित है। यहां के घास के मैदानों में लगभग 400 प्रजातियों की वनस्पतियां पाई जाती हैं।
रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर मोनाली कटोच ने बताया कि पहले यह क्षेत्र रामपारा वीडी (भोजपारा वीडी) के नाम से जाना जाता था और यह वांकानेर के पूर्व राजघराने की संपत्ति थी। यह अभयारण्य पांचाल की ऊबड़-खाबड़ संरचना वाले भू-भाग के मध्य स्थित कांटेदार शुष्क पर्णपाती घास के जंगल के रूप में भी जाना जाता है। वन विभाग ने 1998 में बहते वर्षा जल के संग्रह के लिए एक तालाब बनाया। अभयारण्य के चारों ओर दिसंबर 2017 से 31.08 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईको-सेंसिटिव जोन घोषित किया गया है।
Published on:
22 Feb 2026 09:33 pm
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