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वरिष्ठ संत महामंडलेश्वर भारती बापू नहीं रहे

कोरोना से मौत

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वरिष्ठ संत महामंडलेश्वर भारती बापू नहीं रहे

वरिष्ठ संत महामंडलेश्वर भारती बापू नहीं रहे

राजकोट/जूनागढ़. गुजरात के वरिष्ठ संत महामंडलेश्वर विश्वंभर भारती बापू का कोरोना के कारण अहमदाबाद के सरखेज क्षेत्र स्थित भारती आश्रम में शनिवार मध्यरात्रि बाद करीब ढाई बजे निधन हो गया। वे 93 वर्ष के थे।
लघु महंत ऋषि भारती बापू के अनुसार महामंडलेश्वर विश्वंभर भारती बापू ने शनिवार मध्यरात्रि बाद करीब ढाई बजे अंतिम सांस ली। उनकी पार्थिव देह को सवेरे साढ़े नौ बजे तक दर्शन के लिए रखा। बाद में जूनागढ़ लाया गया। जूनागढ़ में भवनाथ क्षेत्र स्थित भारती आश्रम में कुछ समय तक रखने के बाद कोविड गाइडलाइन के अनुरूप पालखी यात्रा निकाल गई। उसके बाद आश्रम में गुरु गादी हॉल में उनके गुरु अवंतिका भारती बापू की समाधि के समीप ही उन्हें पीपीई किट के साथ ही समाधि दी गई।

कोरोना रोधी टीका लगवाया था, 2 को मनाया 93वां जन्म दिवस

महामंडलेश्वर विश्वंभर भारती बापू ने अहमदाबाद के सरखेज क्षेत्र स्थित भारती आश्रम में पिछले दिनों कोरोना रोधी टीका लगवाया था। पिछली 2 अप्रेल को उनका 93वां जन्मदिन भी मनाया गया था। उस समय संतों व भक्तों की मौजूदगी में माला पहनाकर उनका पूजन किया गया था।

पीएम, सीएम ने दी श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री (पीएम) नरेन्द्र मोदी ने ट्विट कर श्रद्धांजलि दी। मोदी ने लिखा कि जूनागढ़ भारती आश्रम के महामंडलेश्वर विश्वंभर भारतीजी महाराज का उपदेश हमें हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उनके लाखों सेवकों को सांत्वना। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। मुख्यमंत्री (सीएम) विजय रूपाणी ने भी ट्विट कर श्रद्धांजलि दी। रूपाणी ने लिखा कि 1008 महामंडलेश्वर भारती बापू के ब्रह्मलीन होने का समाचार सुनकर शोकमग्न हैं। परमात्मा उनकी दिव्य आत्मा को शांति दे और भक्तगणों को यह दुख सहन करने की शक्ति दे यही प्रार्थना।

1992 में महामंडलेश्वर घोषित किया था

विश्वंभर भारती बापू को वर्ष 1992 में महामंडलेश्वर घोषित किया गया था। अहमदाबाद जिले के अरणेज गांव में मणिबा व हरिभाई के घर जन्म के बाद 16 वर्ष की आयु तक गांव में ही अध्ययन किया। बचपन से ही घर में उन्हें भक्तिमय वातावरण मिला था। उसके बाद वे अहमदाबाद पहुंच गए। वहां उन्होंने साधु परंपरा धारण की थी। महामंडलेश्व विश्वंभर भारती बापू समग्र भारत के साधु समाज में प्रसिद्ध थे। भवनाथ क्षेत्र के सभी साधु समाज के अखाड़ों में उन्हें संत के तौर पर पूजा जाता था।