25 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

महाकुंभ में श्री स्वामीनारायण भाष्य का अ​भिनंदन

भारतीय दर्शन, वेदांत और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने वाला ग्रंथ अहमदाबाद. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ के अवसर पर परब्रह्म स्वामीनारायण प्रबोधित श्री अक्षरपुरुषोत्तम दर्शन पर आधारित श्री स्वामीनारायण भाष्य का स्वागत किया गया। बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के स्वामी भद्रेशदास की लेखनी से प्रस्फुटित हुआ यह भाष्य भारतीय […]

less than 1 minute read
Google source verification

भारतीय दर्शन, वेदांत और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने वाला ग्रंथ

अहमदाबाद. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाकुंभ के अवसर पर परब्रह्म स्वामीनारायण प्रबोधित श्री अक्षरपुरुषोत्तम दर्शन पर आधारित श्री स्वामीनारायण भाष्य का स्वागत किया गया।

बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) के स्वामी भद्रेशदास की लेखनी से प्रस्फुटित हुआ यह भाष्य भारतीय दर्शन, वेदांत और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने वाला ग्रंथ है।

भारत की सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं का सबसे बड़ा संगम महाकुंभ न केवल श्रद्धालुओं के लिए किन्तु संतों, महापुरुषों और धार्मिक मनीषियों के लिए भी एक दिव्य अवसर होता है। जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने श्री स्वामीनारायण भाष्य का स्वागत कर भाष्यकार स्वामी भद्रेशदास की सराहना की।
निर्वाण पीठाधीश्वर स्वामी विशोकानंद, निरंजन पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी कैलाशानंद, आनंद पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद तथा परमार्थ साधक सेवा संघ के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रणब चैतन्यपुरी ने भी इस ग्रंथ की सराहना की। साथ ही इसे संत समाज एवं साधकों के लिए मार्गदर्शक बताया। स्वामी गोविंददेव गिरि ने भी स्वागत किया।
साम्प्रतकाल में महंत स्वामी की ओर से प्रवर्तित यह सिद्धांत केवल स्वामीनारायण संप्रदाय तक सीमित नहीं है, अपितु यह पूरे सनातन धर्म के साधकों के लिए उपयोगी है। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन की उन्नत परंपराओं को वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है, जो प्रत्येक जिज्ञासु के लिए लाभदायक सिद्ध होगा।
संतों ने इस ग्रंथ वेदांत, स्वामीनारायण दर्शन और सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों पर गहन विमर्श भी किया। साथ ही इसे भारतीय शास्त्रों की समृद्धि में एक नया आयाम जोड़ने वाला ग्रंथ बताया और इसका व्यापक प्रचार-प्रसार करने की आवश्यकता पर बल दिया।