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ये जाबांज लड़ाके-इनके नाम से ही कांपते दुश्मन, हो चुके देश के लिए हुए शहीद

अपनी मजबूत कद काठी के लिए जाने जाते हैं पठान। हिन्दुस्तान के कई बादशाहों औ राजाओं की सेना में रहते हुए दिखा चुके बहादुरी।

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gagwana brave peoples

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ये पठान अपनी मजबूत कद-काठी और जांबाजी के बूते जंग में दुश्मनों के दांत खट्टे कर चुके हैं। हिन्दुस्तान के कई हुक्मरानों की सेनाओं में इन्होंने सेवाएं दीं। आक्रांओं के लिए इनका नाम ही खौफ का पर्याय था। बहादुरी के किस्से बरसों बाद भी लोगों की जुबां पर चढ़े हुए है। पीढिय़ों से पठान जाति के कई लोग अजमेर के निकटवर्ती ग्राम गगवाना में बसे हुए हैं। किशनगढ़ के तत्कालीन शासक ने जयपुर व जोधपुर रियासतों के बीच हुए युद्धों के बाद पठानों की बहादुरी से प्रभावित होकर सात घोड़ों की जागीर से नवाजा। तब से बुजुर्ग पठानों के इतिहास की बखूबी चर्चाएं करते हैं।

पठानों के इतिहास में रिसर्च कर रहे सेवानिवृत्त आरपीएस अधिकारी गुल हसन खां ने बताया कि अफ्रीकी देश मिस्र के बीर शेवा गांव के हजरत पैगम्बर इब्राहिम की 12 संतानें थी, जो अरब देशों के विभिन्न प्रांतों के शासक रहे। बारहवीं सतंान इस्माइल-हाजरा दंपती के पुत्र इशहाक और उनके पुत्र याकूब हुए। वे भी पैगम्बर थे। याकूब को इसरायल (इजरायल) भी कहा जाता है। इनके 12 वें नम्बर के पुत्र बिन यामिन की संतानें बठान या पठान कहलाई। फारसी में प शब्द नहीं होता। एेसे में इन्हें बठान कहा जाता था। जिसे बाद में पठान कहने लगे। खां खुद भी पठानों पर रिसर्च पूरी कर चुके हैं। उन्हें इजरायल सरकार ने स्थायी आमंत्रित सदस्य बना रखा है। गत वर्ष उनका संबोधन इजरायल के प्रधानमंत्री की मौजूदगी में हुआ था।

यूं बना जंगवाना से गगवाना

85 वर्षीय लतीफ मोहम्मद खान ने बताया कि 2735 वर्ष पूर्व जेरूसलेम से बनी या पनी पठान इजरायल और वहां से फारस आए। फारस से खुरासान अफ गानिस्तान पहुंचे। खुरासन से सिकंदर लोदी के साथ 14 वीं सदी में दिल्ली पहुंचे। दिल्ली से राजा सवाई जयसिंह के निर्देशों पर जयपुर के अमरसर में डेरा डाला। यहां जयपुर व जोधपुर रियासतों के बीच 11 जून 1741 को हुए युद्ध के बाद जोधपुर की पराजय हुई। पठानों की बहादुरी के कारण ही पठानों को माले गनीमत के रूप में गगवाना क्षेत्र के आसपास के गांवों की जागीरें मिली। युद्ध के कारण इस जगह को जंगवाना कहा जाता था बाद में इसका नाम गगवाना हो गया। कई धार्मिक पुस्तकों, बाइबल व पैगम्बर अले सलाम की किताबों में इनका विस्तार से उल्लेख किया गया है।

मूसा अले सलाम का कबीला

गुल हसन खां के अनुसार इजरायल की एरियल यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष डॉ. दाना के निर्देशों पर ईएल बेयरे रिसर्च स्कॉलर हैं जो गत कुछ वर्षों से पठानों पर शोध कर रहे हैं। पठानों के इतिहास के बारे में बादशाह जहांगीर ने 1605 में फारसी में नेमतउल्ला ने किताब मक्खजान अफगानी में पठानों के इतिहास की गाथा लिखी। मूसाखेल का अर्थ पैगम्बर मूसा अले सलाम का कबीला है। पनी पठान नागड़ झुंझुनूं व कांकड़ हैदराबाद में रहने लगे।

राजाओं व बादशाहों के जमाने से प्रभावशाली

हिन्दुस्तान आने वाले सिंकदर लोदी, बहलोल लोदी, शेरशाह सूरी, सलीम शाह, अहमद शाह अब्दाली के जमाने से ही पनी पठान सक्रिय रहे। कई बादशाआें से गगवाना के कबीले के ताल्लुकात रहे। प्रदेश में हाल ही में अंजुम अल पठान का गठन किया गया है। इसके अध्यक्ष दिल्ली निवासी कर्नल ए. आर. खान तथा जयपुर निवासी एच. एम. खान उपाध्यक्ष हैं। संस्था का वार्षिक कार्यक्रम जयपुर में प्रस्तावित है।

गगवाना से भी निकली हैं कई प्रतिभाएं

गगवाना न केवल पठानों की बहादुरी के लिए ही अपनी पहचान रखता है वरन यहां की प्रतिभाएं खेलकूद, राजनीति व प्रशासनिक क्षेत्रों में भी किसी से कम नहीं है। गगवाना निवासी अता मोहम्मद खान आसाम टी गार्डन निदेशक रह चुके हैं। महराज खान श्रीनगर पंचायत समिति में प्रधान रहे।

गांव के बुजुर्ग मुमताज मोहम्मद खान ने गगवाना का नाम रोशन किया। हसन मोहम्मद खान, सलीम मोहम्मद खान, नवाब खान, रहमत खान, मेहराज खान, असलम खान आदि ने प्रदेश में कबड्डी का परचम लहराया। वर्ष 1979 में राज्य स्तर पर उप विजेता रही और वर्ष 1984 में राज्य स्तर पर विजेता रही। गगवाना के वाजिद अली ने राष्ट्रीय कबड्डी टीम में जापान में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लिया। वहीं इमरान खान बांग्लादेश के खिलाफ कबड्डी टेस्ट सीरीज में दमखम दिखा चुके हैं।

अब गांव में दे रहे कोचिंग

एचएमटी अजमेर की टीम से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके वलीदाद खान गांव में खिलाडिय़ों की नई खेप तैयार करने में जुटे हैं। खान खो-खो के भी अच्छे खिलाड़ी रहे हैं इन्होंने वर्ष 1975 से 1980 तक अजमेर जिले की टीम को स्टेट चैम्पियन बनाए रखा। शारीरिक शिक्षक इकराम खान, असद खान व ताहिर खान भी स्कूली खिलाडिय़ों को तैयार कर रहे हैं।

पढ़ाई पूरी कर नौकरी पाने की कोशिश करेंगे। खेल में भी आगे बढऩे की तमन्ना है। युवा पीढ़ी अब खेती नहीं करना चाहती। शिक्षा दीक्षा प्राप्त कर आगे बढ़ा जा सकता है।

-जांबाज खां कबड्डी में कई प्रतियोगिताएं खेल चुका हूं। खेल में कॅरियर बनाने का लक्ष्य है। अभी स्कूली पढ़ाई कर रहा हूं।

मोहम्मद फैजान

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