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राजस्थान के कॉलेज टीचर्स को मिला बड़ा तोहफा, 70 साल बाद यूं बदल जाएंगे उनके नाम

इस बारे में कार्मिक विभाग ने पदनाम परिवर्तन संबंधित विस्तृत आदेश जारी कर दिए हैं।

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college teachers designation change

college teachers designation change

रक्तिम तिवारी/अजमेर

कॉलेज व्याख्याताओं को अब असिसटेंट और एसोसिएट प्रोफेसर पदनाम मिलेगा। कार्मिक विभाग ने आदेश जारी कर दिए हैं। करीब 70 साल बाद कॉलेज शिक्षकों को यह सम्मान मिलेगा। अब तक यूनिवर्सिटी में ही यह पदनाम दिए जाते थे।

प्रदेश के स्नातक और स्नातकोत्तर कॉलेज में कार्यरत व्याख्याता कई वर्षों से असिसटेंट और एसोसिएट प्रोफेसर पदनाम की मांग कर रहे थे। तकनीकी और उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी की मंजूरी के बाद मुख्य सचिव निहालचंद गोयल ने भी उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को आदेश जारी किए थे। इस बारे में कार्मिक विभाग ने पदनाम परिवर्तन संबंधित विस्तृत आदेश जारी कर दिए हैं।

विश्वव्यिालय महाविद्यालय शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के अध्यक्ष डॉ. दिग्विजयसिंह, महामंत्री डॉ. नारायण लाल गुप्ता ने बताया कि बताया कि कॉलेज शिक्षकों की पदनाम परिवर्तन की बरसों पुरानी मांग पूरी होगी।

पे बैंड-4 में शामिल शिक्षक एसोसिएट प्रोफेसर, पे बैंड-3 में शामिल शिक्षक असिसटेंट प्रोफेसर पदनाम से जाने जाएंगे। प्रदेश के कॉलेज में प्रोफेसर पद भी सृजि किए जाएंगे। कॅरियर एडवांसमेंट स्कीम में 477 शिक्षक प्रोफेसर बन सकेंगे। कॉलेज में प्राचार्यों के 75 प्रतिशत पद एसोसिएट प्रोफेसर और 25 फीसदी प्रोफेसर से भरे जाएंगे।

अब तक यूनिवर्सिटी में ही पदनाम
राज्य में अब तक सरकारी और प्राइवेट यूनिवर्सिटी के टीचर्स को ही असिसटेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पदनाम मिलते रहे हैं। सरकारी कॉलेज के टीचर्स कई साल से इसकी कोशिशें कर रहे थे। यूजीसी भी इस बारे में राज्य सरकार को कई बार आदेश जारी कर चुका था, लेकिन कई स्तरों पर मामला अटका रहा। इस दौरान कॉलेज-यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ने कई बार सरकार से मुलाकात की, पर बात नहीं बनी।

आजादी से पहले होते थे पदनाम
भारत में ब्रिटिशकाल में कई कॉलेज स्थापित हुए हैं। इनमें आगरा , कोलकाता, मुम्बई सहित अजमेर का गर्वनमेंट कॉलेज भी शामिल है। ब्रिटिशकाल में सभी कॉलेज में असिसटेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पदनाम होते थे। जो पीएचडी नहीं होता था उस टीचर को भी प्रोफेसर कहा जाता था। ब्रिटिशकाल में तो टीचर्स को ब्लैक रॉब (गाउन) पहनना भी जरूरी था। आजादी के बाद इसे ब्रिटिश मानसिकता का परिचायक बताते हुए हटा दिया गया।