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ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह में पहली बार टूटी ये परम्परा, जुमेरात महफिल में अचानक हुआ बवाल

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गुरुवार रात जुमेरात की महफिल में दरगाह दीवान जैनुअल आबेदीन की जगह उनके बेटे नसीरूद्दीन के पहुंचने से विवाद

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controversy in khwaza garib nawaz darga jumeeart programme

अजमेर . ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में गुरुवार रात जुमेरात की महफिल में दरगाह दीवान जैनुअल आबेदीन की जगह उनके बेटे नसीरूद्दीन के पहुंचने से विवाद हो गया। महफिल की व्यवस्था करने वाले मौरूसी अमले के सदस्यों ने महफिल का बहिष्कार कर दिया। वहीं शाही चौकी के कव्वालों ने भी कव्वालियां नहीं पेश की। इसके चलते दरगाह में पहली बार ऐसा हुआ कि जुमेरात की महफिल ही नहीं हो सकी। दरगाह दीवान के बेटे को बिना महफिल के ही वापस लौटना पड़ गया।

दरगाह दीवान आबेदीन की ओर से बेटे को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने का विरोध अभी थमा नहीं है। विरोध के चलते पिछले दो जुमेरात को दरगाह दीवान खुद ही दरगाह आए और महफिल की सदारत की। लेकिन बताया जा रहा है कि इस गुरुवार को दरगाह दीवान के अजमेर में नहीं होने के कारण बेटे नसीरूद्दीन को महफिल की सदारत के लिए भेजा गया। दीवान के बेटे को उत्तराधिकारी घोषित किए जाने का खादिम लगातार विरोध कर रहे हैं। मुस्लिम एकता मंच के सदस्यों ने पिछले दिनों यह चेतावनी भी दी थी कि दीवान की जगह उनके बेटे को भेजा गया तो विरोध किया जाएगा। इसे देखते हुए मौरूसी अमले के सदस्य पीछे हट गए। उन्होंने महफिल में सहयोग नहीं किया। कव्वालियां भी नहीं गाई। रात करीब 10 बजे तक दरगाह दीवान के बेटे नसीरूद्दीन सुरक्षा कर्मियों के साथ आहता-ए-नूर में बैठे रहे। बाद में महफिल का समय समाप्त होने पर उन्हें वहां से लौटना पड़ा।


पहले यह टूटी परम्पराएं

1. उर्स के दौरान आखिरी गुस्ल की रस्म में दरगाह दीवान शामिल नहीं हो सके। पहली बार दीवान के बिना यह रस्म खादिमों ने ही अदा की।

2. सांभर में हजरत हिसामुद्दीन के उर्स से लौटने के बाद दरगाह दीवान के बेटे नसीरूद्दीन ख्वाजा साहब की दरगाह पहुंचे लेकिन वहां शादियाने नहीं बजाए गए।

दरगाह कमेटी जिम्मेदार

दरगाह के बेटे नसीरूद्दीन का इस सबंध में कहना है कि वे दरगाह दीवान के प्रतिनिधि के रूप में महफिल की सदारत करने पहुंचे थे। कुछ रस्में क्यों नहीं हुई, इसके लिए दरगाह कमेटी जिम्मेदार है। दरगाह नाजिम को इस संबंध में कार्रवाई करनी चाहिए। क्योंकि यह गरीब नवाज की परम्परा है।
मौरूसी अमला सहीमुस्लिम एकता मंच के जुल्फिकार चिश्ती, पीर नफीस मियां चिश्ती, गुलाम मुस्तफा, काजी मुनव्वर आदि ने कहा कि मौरूसी अमले ने जो किया वह सही था। विवाद दरगाह कमेटी ने उत्पन्न किया है। उधर खादिम एस.एफ.हसन चिश्ती ने कहा कि ऑन रिकॉर्ड जो दीवान है, वही महफिल में आना चाहिए। ऐसे में मौरूसी अमले की कार्रवाई जायज है। मौरूसी अमले की आड़बताया जा रहा है कि दीवान के बेटे नसीरूद्दीन को लेने के लिए दरगाह कमेटी स्टाफ में मशालची और फानूसबरदार ही पहुंचे थे।

यह भी बताया जा रहा है कि दीवान के बेटे के पहुंचने पर घडिय़ाली ने घंटा भी बजाया। बाद में मौरूसी अमला अलग हो गया। खास बात यह रही कि मौरूसी अमले का साथ मिल जाने से इस बार खादिमों को विरोध करने की जरूरत नहीं पड़ी। अमले को समझाने के लिए सहायक नाजिम मोहम्मद आदिल मौके पर भी पहुंचे लेकिन वे नहीं माने। इससे पहले दरगाह नाजिम आई.बी.पीरजादा ने भी यह समझाइश की थी कि दीवान खुद ही दरगाह आए, लेकिन दीवान के यहां नहीं होने से बेटे को ही दरगाह आना पड़ा।