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वैश्विक मंदी की मार से पैंट्स श्रमिक भी नहीं रहे अछूते

रंगाई-पुताई कराने से भवन मालिक काट रहे कन्नी, पिछले साल के मुकाबले पचास फीसदी व्यवसाय,श्रमिकों में नहीं उत्साह, दुकानदारों में निराशा

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Dyeing workers are also affected by the global recession

अजमेर स्थित पेंट्स की एक शॉप

अजमेर. भला कौन नहीं चाहेगा कि उसका मकान साफ-सुथरा और दमकता रहे। नया भवन बनाया है तो मनपसंद कलर कराने की भी इच्छा रहती है। पुराने भवन सामान्यतया दीपावली पर ही पुताते आए हैं।

इस साल मंदी की मार है। अजमेर शहर के कई मकानों की लोग पुताई नहीं करा पाए। पिछले साल जो उत्साह था। वह इस बार नजर नहीं आ रहा। इसके चलते भवनों की रंगाई-पुताई वाले श्रमिक ठाले बैठे हैं।

इस वर्ष उन्हें अपेक्षित रोजगार नहीं मिल पा रहा। वैसे तो पूरे साल यह काम चलता रहता है, लेकिन दीपावली को ‘सीजन’ माना जाता है। अजमेर शहर की विभिन्न कॉलोनियों में नए-नए भवन बनाए जा रहे हैं। पहले से ही यहां आवासीय बस्तियां हैं। यहीं पर बिल्डिंगों में रंगाई-पुताई का काम अधिक होता आया है।

कलई से परहेज,बाजार में कई पैंट्स छाए

आजकल सफेद कलई को लोग बहुत कम लोग पसंद कर रहे हैं। इसकी वजह कलई की अनुपलब्धता, मेहनत अधिक और आकर्षण में कमी को माना जा सकता है। जानकारों के अनुसार नागौर जिले के गोटन की कलई काफी प्रचलित है। यहां खदानों में बड़े-बड़े लाइम स्टोन निकलते हैं।

बाद में भट्टों में पकाकर कलई के टोटे तैयार कर पैकिंग या खुले में आपूर्ति किए जा रहे हैं। अब बाजार में कई तरह के पैंट्स आ गए हैं,जिन्हें लोग अधिक पसंद कर रहे हैं। कलर विक्रेता ताराचंद पारवानी के अनुसार गोटन की कलई की खपत अब दस फीसदी भी नहीं रही। आजकल बाजार में डिस्टम्बर, प्लास्टिक पैंट्स, एनामिल पैंट्स सहित कई रंगों के पैंटस उपलब्ध है।

जो रेडिमेड हैं और रंगाई-पुताई के बाद आकर्षक लगते हैं। श्रमिक भी ऐसे ही कलर्स को पसंद करते हैं,क्योंकि तैयार करने व पुताई में अधिक मेहनत नहीं होती। अजमेर शहर में करीब १२५ पैंट्स के शॉप हैं। सभी पर इस साल मंदी की मार हैं।

पचास फीसदी व्यवसाय

अजमेर शहर की पैंटस दुकानों पर इस साल काफी कम बिक्री हुई है। दुकानदारों ने काफी स्टॉक रखा है,लेकिन पिछले साल के मुकाबले पचास फीसदी भी बिक्री नहीं हुई। रंगाई-पुताई के ठेकेदार देवीलाल,श्रवण कुमार,रंगलाल,रमेश चंद व मुकेश महावर ने बताया कि इस साल मजदूरों को अपेक्षित रोजगार नहीं मिला।

दीपावली से एक-दो माह पहले भवनों की साफ-सफाई व पुताई का कार्य शुरू हो जाता था। पहले दीवारों की सफाई करनी होती है। उसके बाद पुटिंग से छोटे-छोटे गड्ढे भरे जाते हैं। फिर से दो से तीन बार दीवार की पुताई करनी होती है। तब जाकर भवन दमकने लगते हैं। इस साल भवन मालिकों ने रंगाई-पुताई में खास रूचि नहीं दिखाई। खुदरा श्रमिकों की भी यही स्थिति है। भवनों की रंगाई-पुताई के लिए पांच से छह सौ रुपए दैनिक मजदूरी मिल जाती है, लेकिन अधिकतर श्रमिकों के लिए इस बार दीपावली ‘खुशियां ’ लेकर नहीं आई।

मिल गई तो रोजी नहीं तो....

दैनिक मजदूरों को माह में सिर्फ बीस दिन ही रोजगार मिल पाता है। शेष दिन ठाले बैठना मजबूरी है। घर से तडक़े उठकर कलेवा कर खाने का टिफिन लेकर आने वाले ऐसे सैंकड़ों मजदूर अजमेर शहर के विभिन्न स्थानों पर एकत्र होते हैं। सुबह ११ बजे तक महिला व पुरुष श्रमिक रोजगार की प्रतीक्षा में रहते हैं।

इनमें से सत्तर फीसदी मजदूरों को काम नहीं मिल पाता, क्योंकि अधिकतर श्रमिक ठेकेदारों के खुद के होते हैं। खुले रूप से काम करने वाले श्रमिक भी मंदी की चपेट में हैं। कई श्रमिकों को रोजगार नहीं मिल पाने की स्थिति में घर निराश लौटना पड़ रहा है।