
ajmer literature festival 2017
रक्तिम तिवारी/अजमेर।
पौष की गुनगुनी धूप में शब्दों ने फिजा में बरबस रस घोला। ये कभी गीत-गजल और शेरो-शायरी बनकर गूंजे तो कभी साहित्य का रूप ओढ़कर मनोभाव समझाते दिखे। शब्दों के रचयिता कवियों, लेखकों, गीतकारों और कथाकारों ने अंतर्मन की आवाज से सुनने वालों को रूबरू कराया। आदर्श नगर के मुकुंद गार्डन में शुरू हुए चौथे अजमेर लिटरेचर फेस्टिवल में यह रंग दिखाई दिए। साहित्य के महाकुंभ में देर शाम तक श्रोता और वक्ताओं के बीच अद्भुत तारतम्य नजर आया।
कालजयी फिल्मी गीत शोखियों में घोला जाए... के रचयिता गीतकार गोपालदास नीरज ने उम्र के पैमाने को पीछे छोड़ते हुए श्रोताओं से बातचीत की। उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा कि शब्द वास्तव में जीवन यात्रा है। ये इंसान को कभी मिलाते तो कभी बिछड़ाते हैं। बगैर सोचे-समझे बोला गया एक 'शब्द मेहनत पर पानी फेर देता है। इससे देश-विदेश में सरकारें जाती हैं। शब्द और बात सदैव तोल-मोल कर बोलने चाहिए। इसमें समाज, देश और राष्ट्र का हित है। 'शब्द वन में गीत ऋषिÓ सत्र में नीरज ने दुनिया के बाजार में ऐसा हुआ छलावा...., आत्मा का सौंदर्य है शब्द......, बिछडऩे के लिए ये मेल-मिलाप एक मुसाफिर तुम एक मुसाफिर हम...शेर सुनाकर श्रोताओं की दाद पाई। इस दौरान संयोजक रासबिहारी गौड़ ने स्वागत किया। इस दौरान सोमरत्न आर्य, नवीन सोगानी, रेखा गोयल, ललित जैन, रजनी भार्गव और अन्य मौजूद थे।
साहित्य में संवेदना और प्रतिरोध...
'साहित्य संवेदनाओं का पर्व सत्र में शायर डॉ. गौहर रजा ने कहा कि साहित्य में संवेदना और प्रतिरोध होता है। अंग्रेजी में टॉलरेंस और सेंसेटिव शब्द हैं, पर इसकी विस्तृत व्याख्या मुश्किल है। साहित्य या अदब बिना प्रतिरोध के पैदा नहीं हो सकता। कल, आज और भविष्य में क्या उसको साहित्यकार अपने चश्मे से देखता है। रूस, जर्मनी, फ्रांस की क्रांति, दक्षिणी अफ्रीका, लैटिन अमरीकी देशों के साहित्य में कहीं ना कहीं प्रतिरोध, संवेदना दिखाई देती है। साहित्य या ता नारों या सिर्फ साहित्य का स्वरूप है।
मौजूदा युग में ध्रुवीकरण, भूमंडलीकरण, आर्थिक क्रांति भी इसका स्वरूप है। पिछले कुछ बरसों में साहित्यिक मंचों पर कहीं ना कहीं प्रतिरोध दिखता है। साहित्यकार सवाई सिंह शेखावत ने कहा कि साहित्य में संवेदना मूल रूप है। यह कृपा या मेहरबानी नहीं है। साहित्य मनुष्य को निखारता और गढ़ता है। संवेदना का मान गहरा होता है। संस्कृति उसको परिष्कृत करती है। डॉ. अनन्त भटनागर ने कहा कि साहित्य का कार्य संवेदना जागृत करना और समय का वाजिब प्रतिरोध करना है। इसमें सभी तरह के भाव अंतर्निहित होते हैं। संचालन डॉ. विमलेश शर्मा ने किया।
अब न वो साकी न वो पैमाना है...
लेखक और गीतकार गोपालदास नीरज ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि देश की राजनीति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। सैकड़ों सियासी दल बन गए हैं। सबके अपने राग अपने क्रियाकलाप हैं। कोई कुछ तो कुछ कहता है। नारों, जुमलों के जमाने में बेरोजगारी, लूट-पाट, डकैती, दुष्कर्म जैसी बुराइयां बढ़ रही हैं। वास्तव में इन सब की बजाय देश में दो दल ही रहें तो ठीक हैं। मौजूदा फिल्मी गीतो के बदलते शब्द और मायने से जुड़े सवाल पर नीरज ने शेर...अब न वो साकी है न वो पैमाना है, लबों पर जाम है न मैखाना है... सुनाकर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि गीत यूं ही नहीं बनते बल्कि उन्हें जीना और दिल की आवाज से पैदा करना पड़ता है।
Published on:
22 Dec 2017 08:14 am
