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बदलाव: संस्कृत बन रही अजमेर के गांव ‘सावर’ की बोलचाल की भाषा, अन्य राज्यों के ये हैं ‘संस्कृत गांव’

Monday Positive Story: सावर गांव की आबादी करीब 20 हजार है। इनमें से 3000 से अधिक लोग संस्कृत संभाषण में निपुण हैं। करीब 6000 लोग संस्कृत भाषा में बोलने पर समझते हैं। हर वर्ष 100 नए बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं।

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अजमेर

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Akshita Deora

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चन्द्र प्रकाश जोशी

Sep 01, 2025

फोटो: पत्रिका

Ajmer Sanskrit Village Name: गांव की माटी में संस्कृत की महक घुलने के साथ अब दीवारें भी संस्कृत ‘बोलने’ लगी हैं। बच्चे, युवा, बुजुर्ग भी संस्कृत में बोलने लगे हैं। पिछले वर्षों में संस्कृत से जुड़ी संस्थाओं के प्रयास से संस्कृत गांव बनाने का प्रयास चल रहा है। सरकार ने भी संस्कृत का माहौल बनाने में स्कूल, कॉलेज को बढ़ावा दिया है। अजमेर जिले के सावर सहित प्रदेश के तीन गांवों में तय लक्ष्य के साथ संस्कृत को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनमें बांसवाड़ा का गनेड़ा, बूंदी का कापरेन गांव भी शामिल हैं। संस्कृत भारती सहित कुछ संस्थाओं की ओर से इन गांवों को संस्कृत गांव बनाने की योजना है।

सावर गांव की आबादी करीब 20 हजार है। इनमें से 3000 से अधिक लोग संस्कृत संभाषण में निपुण हैं। करीब 6000 लोग संस्कृत भाषा में बोलने पर समझते हैं। हर वर्ष 100 नए बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं। यहां राजकीय संस्कृत शास्त्री कॉलेज, राजकीय संस्कृत उपाध्याय स्कूल (कक्षा 1 से 12 तक हैं)।

अन्य राज्यों के यह संस्कृत गांव

कर्नाटक में मट्टूर पहला संस्कृत गांव है। मधयप्रदेश का झिरी गांव भी संस्कृत गांव है। उत्तराखंड में सरकार 15 से 17 गांव संस्कृत गांव बनाने को प्रयासरत हैं।

संस्कृत शास्त्रीय एवं व्यावहारिक भाषा: संस्कृत वैज्ञानिक, संस्कृत शास्त्रीय एवं व्यावहारिक भाषा है। शास्त्रीय में श्लोक, ग्रंथ आदि हैं। व्यावहारिक भाषा सरल होने से लोगों का जुड़ाव बढ़ रहा है। प्रत्यक्ष विधि में वस्तु, भाव के माध्यम में संस्कृत संभाषण करना आसान होता है। कई भाषाएं संस्कृत से निकली हैं। मराठी में 95 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। संभाषण शिविर में कार्यकर्ता तैयार होकर संस्कृत का प्रसार कर रहे हैं। राजस्थान में करीब 20 हजार कार्यकर्ता हैं, शिविरों में करीब 1 लाख ने प्रशिक्षण लिया है।

  • डॉ. आशुतोष पारीक, लेक्चरर व विभाग संयोजक संस्कृत भारती, अजमेर

इन गतिविधियों ने बदले हालात

संस्कृत संभाषण शिविर: ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन अवकाश में शिविर।

संस्कृत संध्या: स्त्रोतपाठ, सामूहिक रूप से वाचन।

श्लोक लेखन: गांव की दीवारों पर संस्कृत श्लोक लेखन।

सामाजिक शिविर: समाज के सभी वर्ग के लोग, सेवानिवृत डॉक्टर, कर्मचारी या किसान, दुकानदार भी संस्कृत सीखने आते हैं।

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