कहा जाता है अदालती प्रक्रिया बहुत लंबी चलती है। पिता केस दायर करता है तो पोता उसका फैसला ले पाता है। ऐसा ही एक मामला अजमेर के राजस्व मंडल में भी चल रहा है।
दिलीप शर्मा/अजमेर। कहा जाता है अदालती प्रक्रिया बहुत लंबी चलती है। पिता केस दायर करता है तो पोता उसका फैसला ले पाता है। ऐसा ही एक मामला अजमेर के राजस्व मंडल में भी चल रहा है। इसमें पड़पोता जमीन के हक के लिए चौथी पीढ़ी के रूप में पक्षकार बनने के लिए कानूनी जंग लड़ रहा है।
राजस्व मंडल के इतिहास का सबसे पुराना मुकदमा यूआईटी जोधपुर बनाम यासुद्दीन है जो वर्ष 1976 से लंबित है। कई बार इस प्रकरण की फाइल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई, फिलहाल वहां से वर्ष 2010 में खारिज होने के बाद फाइल फिर से राजस्व मंडल में है। प्रकरण में काफी संख्या में सरकारी व पक्षकारों के वकीलों ने उपिस्थति दर्ज कराई है। वर्तमान में अपीलार्थी के पड़पौत्र के पक्षकार बनने की अर्जी पर सुनवाई इसी सप्ताह होनी है। प्रकरण जोधपुर यूआईटी की करोड़ों की कीमत की करीब 40 बीघा जमीन से जुड़ा है।
जोधपुर राजघराने ने दिया था पट्टा
प्रकरण से जुड़ी राजस्व मंडल की वकील ज्योति पारीक ने बताया कि उनके दिवंगत पिता सूरजनारायण पारीक भी प्रकरण की पैरवी करते थे। ज्योति ने बताया कि 1858 में जोधपुर के तत्कालीन महाराजा मान सिंह ने इमारती पट्टे के रूप में बुद्धशेख को 40 बीघा भूमि दी। इस पर वह कृषि व मकान बना सकता था। इसके बाद उनके वंशज नत्थू व उनके वंशज यासुद्दीन जिनके नाम से केस लंबित है का निधन होने के बाद उनके पुत्र जैनुद्दीन के नाम भूमि की वसीयत है। यासुद्दीन की मृत्यु के बाद अब जैनुद़दीन को प्रकरण में पक्षकार बनाने की अर्जी पर बहस होनी है। प्रकरण में आगामी पेशी 22 दिसम्बर है।
तारीख पे तारीख, नहीं मिला इंसाफ
- 1858 में बुद्धशेख को इमारती पट्टा मिला
- आवासीय व कृषि करने की अनुमति
- 16 अक्टूबर 1975 को तहसीलदार रिपोर्ट के बाद कलक्टर ने सेटअपार्ट या अधिग्रहित की
- 2 जुलाई 1976 में कब्जे के आधार पर राजस्व अपील अधिकारी जोधपुर ने अपील मंजूर की
- 1976 में सरकार ने राजस्व मंडल में अपील दायर की
- यासुद्दीन ने भी राजस्व मंडल में अपील दायर की
- 25 फरवरी 1976 को राजस्व मंडल में अपील खारिज
- 20 फरवरी 1983 में पुनर्विलोकन या रिव्यू याचिका खारिज
- 10 अक्टूबर 1985 में रिव्यू मंजूर
- 30 मई 1986 को यूआईटी जोधपुर व सरकार ने विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में पेश की
- 23 अगस्त 1999 - यासुदद्दीन की विशेष अपील मेंटेनेबल नहीं मानते हुए हाईकोर्ट ने खारिज कर दी
- 18 दिसम्बर 2000 को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल अपील खारिज
- 29 जनवरी 2001 को यासुद्दीन के निधन के बाद उनके पुत्र जैनुददीन ने पक्षकार बनने की अर्जी लगाई
- 9 मार्च 2010 सुप्रीम कोर्ट से विशेष अनुमति याचिका खारिज
- 2010 से निरंतर तारीखें। फाइल सुप्रीम कोर्ट में होने के कारण
- दिसम्बर 2022 में पेशी - पक्षकार बनने के लिए अर्जी पर बहस।