अजमेर

राजस्थान बदलेगा उड़ीसा के आदिवासियों की तकदीर

कोरापुट जिले में लहलहाएंगी बीजीय मसाला फसलें मिलेगा रोजगार, बढ़ेगी आमदनी

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Sep 22, 2022
सौफ की फसल,सौफ की फसल,सौफ की फसल

अनिल कैले

अजमेर। राजस्थान जल्द ही उड़ीसा के नक्सल प्रभावित आदिवासी कोरापुट जिले की तकदीर बदलने की ओर कदम बढ़ाने वाला है। राजस्थान में उत्पादित जीरा, सौंफ, धनिया, कलौंजी जैसी बीजीए मसाला फसलों के उत्पादन का प्रयोग कोरापुट में करने की तैयारी है। योजना कामयाब हुई तो नक्सल समस्या से जूझ रहे आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। उनको रोजगार तो मिलेगा ही साथ में वे उत्तम दर्जे की फसल के निर्यात से विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर सकेंगे।

उड़ीसा सरकार ने मांगे थे प्रस्ताव

उड़ीसा सरकार ने करीब आठ माह पहले कृषि अनुसंधान में लगे संस्थानों से आदिवासी जिलों में कृषि विकास के लिए प्रस्ताव मांगे थे। अजमेर के तबीजी में स्थित राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केन्द्र ने भी करीब साठ लाख रुपए का प्रस्ताव उड़ीसा सरकार को भेजा था। केन्द्र ने कोरापुट में दस बीजीय मसालों की खेती की तकनीक सिखाने का प्रस्ताव भेजा है।

ये हैं बीजीय मसाले

जीरा, आजवाइन, सौंफ, विलायती सौँफ, कलौंजी, धनिया, मेथी, सोवा और स्याह जीरा

उत्पादन से लेकर बाजार के सिखाएंगे गुर

केन्द्र के निदेशक डॉ. शैलेन्द्र नाथ सक्सेना ने बताया कि प्रस्ताव को हरी झंडी मिलने पर केन्द्र के वैज्ञानिकों की टीम कोरापुट जिले का दौरा करेगी। दस बीजीय मसालों के लिए आधा-आधा हेक्टेयर के दस खेेतों का चयन कर फसल की अनुकूलन क्षमता का परीक्षण किया जाएगा। सकारात्मक संकेत के बाद मसालों की बुवाई की जाएगी। चार से पांच महीने में फसल पक जाने पर उनकी गुणवत्ता का परीक्षण किया जाएगा। सक्सेना ने बताया कि दस में से तीन या चार मसालों की फसल कामयाब हो गई तो बड़ी उपलिब्ध मानी जाएगी। उन्होंने बताया कि आदिवासी क्षेत्र होने के कारण वहां रासायनिक उर्वरकों और पेस्टीसाइड के उपयोग की संभावना बहुत कम है। इसलिए उच्च गुणवत्ता के बीजीय मसालों का उत्पादन किया जा सकेगा। आदिवासियों को फसल उगाने की तकनीक के साथ - साथ फसल से विभिन्न् उत्पाद बनाने और पैकेजिंग का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।

एक हेक्टेयर से 10 क्विंटल उत्पादन

बीजीय मसाला फसलों की खेती 'हींग लगे ना फिटकरी, रंग आए चोखा' कहावत की तरह है। मौसम अनुकूल मिलने पर किसान चार महीेने में एक हेक्टेयर से करीब डेढ़ लाख रुपए कमा सकता है। डॉ. सक्सेना बताते हैं कि एक हेक्टेयर में जीरा की बुवाई पर करीब 40 से 50 हजार रुपए का खर्च आता है। एक हेक्टेयर से दस क्विंटल जीरा उत्पादन होता है। दो सौ रुपए प्रति किलो के विक्रय पर किसान दो लाख रुपए कमा सकता है। इसी प्रकार मेथी और अन्य बीजीय मसालों की खेती से किसान अपनी आर्थिक हालत सुधार सकते हैं।

Published on:
22 Sept 2022 02:56 am
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