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दस दिन में जुड़ा ऐसा ‘रिश्ता’ कि अब 12 हजार किमी से राजियावास आते हैं न्यूजीलैंड के रॉब

भारत घूमने आए रॉब हायवड के साथ 1990 में घटी थी वारदात, रावत परिवार ने दिया साथ, अपनत्व का रिश्ता निभाने आते हैं भारत

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New Zealand

नारायण सिंह पंवार के घर पर परिवार के साथ बैठे न्यूजीलैंड के रॉब हायवुड।

जीवन एक सफर है। इस सफर के कुछ पल ऐसे होते हैं जो रिश्तों को प्रगाढ़ बना देते हैं। यह प्रगाढ़ता सफर में साथ छूट जाने के बावजूद अंतस: से बिसराई नहीं जा सकती। कुछ ऐसी ही प्रगाढता न्यूजीलैंड के रॉब की ब्यावर के निकट ग्राम राजियावास से हो गई। वे तीन दशक से 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर नियमित अंतराल से यहां आकर अपनी यादों के साथ उस अपनत्व का रिश्ता निभा रहे हैं।

वर्ष 1990 में भारत भ्रमण पर आए

न्यूजीलैंड के साउथ आईलैंड के फेनसाइड जिले के नार्थ केन्टावरी निवासी रॉबहायवुड वहां टेलीकम्यूनिकेशन कम्पनी के कर्मचारी हैं। वे वर्ष 1990 में भारत भ्रमण पर आए। उस दौरान उन्होंने प्रदेश के कई क्षेत्रों का साइकिल पर भ्रमण किया। इस दौरान उनके साथ उदयपुर में करीब 20 हजार रुपए की ठगी हो गई। वे उदयपुर से साइकिल पर पुष्कर के लिए रवाना हुए। भीम के पास पहुंचे तो उनकी साइकिल खराब हो गई। उस समय गियर वाली साइकिल को दुरुस्त करने के लिए कोई मिस्त्री नहीं मिला।

ट्रक वाले से ली लिफ्ट

उन्होंने भीम से एक ट्रक वाले से लिफ्ट ली और साइकिल को ट्रक में रख दिया। उन्हें अजमेर उतरना था। रॉब बताते हैं कि ट्रक चालक ने रास्ते में शराब का सेवन शुरू कर दिया। राजियावास के पास पहुंचकर ट्रक को रोक दिया। भीम से अजमेर तक का जो किराया तय किया उसकी दस गुना राशि की मांग करने लगा। इस पर उनके बीच विवाद हो गया।

ट्रक चालक के चंगुल से छुड़वाया

ट्रक चालक व खलासी उनके साथ धक्का-मुक्की पर उतारू हो गए। इस दौरान राजियावास निवासी शिक्षक चन्द्रभान सिंह वहां पहुंचे। उन्होंने उसे ट्रक चालक के चंगुल से छुड़वाया एवं रात हो जाने के कारण उसे अपने घर ले आए। परेशानी के समय राजियावास में चन्द्रभान के पिता दिवंगत मूलसिंह रावत के घर मिले संबल को वे आज भी याद करते हैं। इन दिनों वे राजियावास आए हुए हैं। रविवार को वे पेंशनर समाज अध्यक्ष और चन्द्रभान सिंह के बहनोई नारायण सिंह पंवार के घर पर पहुंचे।

तीन दशक के सफर को किया साझा

इस दौरान उन्होंने पत्रिका के साथ अपने तीन दशक के इस सफर की यादों को साझा किया। राॅब ने बताया कि उस समय वह इतना घबरा गए थे कि उस रात कुछ नहीं खाया और भूखे ही सो गए। दूसरे दिन मूलसिंह रावत ने उनसे अंग्रेजी में कुछ देर बात की और उन्हें ब्यावर तक घुमाने लाए। इसके बाद उन्हें विश्वास हुआ एवं खाना खाया।

एक रुपया खर्च नहीं होने दिया

इसके बाद मूलसिंह उन्हें अपनी कार में पुष्कर लेकर गए, वहीं पर उसने करेंसी चेंज करवाई। इस दौरान उन्होंने रॉब का एक रुपया भी खर्च नहीं होने दिया। इससे प्रभावित होकर 1990 में करीब 10 दिन उनके साथ राजियावास में गुजारे। इसके बाद वे स्वदेश लौट गए। दस दिन में इतना गहरा रिश्ता बना कि अब मूलसिंह रावत की मृत्यु हो चुकी है, फिर भी इनके परिवार से मिलने वे न्यूजीलैंड से यहां आते हैं।

अब भी रख रखे हैं पत्र

रॉब बताते हैं कि उक्त घटना के बाद जब उनकी शादी हुई तो पत्नी के साथ वर्ष 1993 में राजियावास आए एवं मूलसिंह रावत से आशीर्वाद लिया। इसके बाद बच्चों के साथ उन्हें राजियावास मिलाने के लिए 2001 में यहां लाए। इसके बाद 2007 तथा अब लम्बे समय बाद वापस यहां मिलने आए हैं। वे बताते हैं कि मूलसिंह उन्हें पत्र लिखा करते थे, वे पत्र अब भी उन्होंने अपनी संग्रहणीय सामग्री में संभाल कर रखे हैं।

एक-दूसरे के प्रति प्रेम देख हुए प्रभावित

रॉब बताते हैं कि वे यहां गांव में ही रुकते हैं। गांव में सामान्य संसाधनों के बीच लोगों में खुशी देख वे खासे प्रभावित हुए। यहां लोगों में एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम है। करीब तीन दशक के इस अंतराल में जीवन स्तर में खासा बदलाव आया है। संसाधन व सुविधाएं बढी हैं। वे बताते हैं कि यहां आबादी बहुत है। इसके बावजूद सरकार की नि:शुल्क शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था अनुकरणीय है।

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