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संकट में वन्यजीव : मगरा क्षेत्र में छह साल में 18 पैंथरों ने तोड़ा दम

वन विभाग : ड्रोन कैमरे से सर्वे कर बनाया था प्रोजेक्ट, प्रस्तावों को तीन साल बाद भी नहीं मिली मंजूरी, तीन साल में नौ पैंथर की हो चुकी है मौत, मगरा क्षेत्र में पैंथरों के लिए खुराक व पेयजल की कमी भी एक वजह  

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संकट में वन्यजीव : मगरा क्षेत्र में छह साल में 18 पैंथरों ने तोड़ा दम

संकट में वन्यजीव : मगरा क्षेत्र में छह साल में 18 पैंथरों ने तोड़ा दम

Ajmer अजमेर/ब्यावर. अजमेर जिला अरावली पर्वतमाला की शृंखलाओं से घिरा हुआ है। ऐसे में वन्यजीवों की बहुतायत है,लेकिन इनकी सुरक्षा खतरे में हैं। यही वजह है कि पैंथर अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं। वर्ष 2014 से अब तक मगरा क्षेत्र में 18 पैंथरों की मौत होना वाकई चिंता का विषय है। जिले के मगरा क्षेत्र में पिछले कुछ बरसों से एक नियमित अंतराल के बाद पैंथर अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं।

पिछले करीब छह साल में पैंथर की मौत के मामले सामने आने पर विभाग ने लेपर्ड प्रोजेक्ट तैयार कराया था। इसके तहत क्षेत्र का ड्रोन कैमरे से सर्वे कराया गया। इसके आधार पर वन विभाग ने प्रोजेक्ट तैयार कर विभाग को भिजवाया। करीब तीन साल के बावजूद अब तक यह प्रोजेक्ट फाइलों से नहीं निकल सका है। दूसरी ओर पैंथर की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसके अलावा टे्रक्यूलाइजर गन मंगवाने का भी प्रस्ताव भिजवाया गया, लेकिन यह प्रस्ताव कागजों में सिमट कर रह गए हैं।

खुराक व पेयजल की कमी

जानकारों की मानें तो मगरा क्षेत्र में अवैध खनन थम नहीं रहा। पैंथर जैसे मांसाहारी वन्यजीव के लिए क्षेत्र में खुराक की कमी है। यही वजह है कि पैंथर आबादी क्षेत्र में घुसकर पालतु मवेशियों का शिकार करने को मजबूर हैं। इलाके में वन्यजीवों के लिए पेयजल की समुचित पेयजल की कमी है। पैंथर के लिए मगर क्षेत्र अब सुरक्षित नहीं रहा। पैंथर की भूख-प्यास से मौत होना गंभीर मसला है। इलाके में कोलाहाल बढ़ रहा है। मानव की गतिविधियों से वन्यजीव अपने को असहज महसूस कर रहे हैं।

मगरा क्षेत्र पैंथर के लिए अब असुरक्षित जोन

मगरा क्षेत्र पैंथर के लिए अब असुरक्षित जोन बनता जा रहा है। करीब तीन साल में 09 से अधिक पैंथर की मौत के बाद भी प्रशासन नहीं चेता है। टॉडगढ़-रावली से जुड़ी ब्यावर रेंज दस हजार हैक्टेयर में फैला हुआ है। इस क्षेत्र में खनन सहित अन्य हस्तक्षेप के बाद पैंथर प्रजाति पर संकट मंडरा रहा है। कुंभलगढ़ अभयारण्य से टॉडगढ़-रावली अभयारण्य जुड़ा हुआ है। करीब दो सौ किलोमीटर के इस क्षेत्र में कई वन्य जीव विचरण करते हैं। रावली अभयारण्य से निकलकर यह पैंथर ब्यावर रेंज में प्रवेश करते ही इनका संकट शुरू हो जाता है। यहां आते-आते जंगल की चौड़ाई महज 40 से 50 किलोमीटर तक रह जाती है। इसके बीच में कई स्थान पर अवैध खनन हो रहा है।

क्षेत्रीय वन अधिकारी भैंरूसिंह के अनुसार लेपर्ड प्रोजेक्ट को लेकर सर्वे कर भिजवाया गया था। इस प्रोजेक्ट को लेकर विभाग से कोई दिशा-निर्देश नहीं मिले हैं।

साल 2014 से अब तक 18 पैंथर की मौत

ब्यावर वन क्षेत्र में वर्ष 2014 से अब तक करीब 18 पैंथर की मौत हो चुकी है। विभाग इन सबके बावजूद लाचार है। पैंथर शिकार को लेकर मामले भी दर्ज किए गए, लेकिन इनमें विभाग कोई खास कार्रवाई नहीं कर सका है। अब तक पैंथर की मौत के मामलों पर नजर डालें तो 15 फरवरी 2014 को सोनियाना में एक पैंथर एवं इसी दिन विहार रतनपुरा में दो शावक की मृत्यु हुई।

16 जून 2014 को सेलीबेरी, 03 जुलाई 2015 को खातियों की ढाणी, 15 नवंबर 2015 चार खंभा से नाईकलां सडक़ पर, 10 जनवरी 2016 को कलातखेड़ा जंगल, 10 दिसंबर 2016 को सरवीणा पहाड़ी पर, 21 दिसंबर 2016 को सरवीणा, 29 नवंबर 2018 को सुरडिय़ा, एक दिसंबर 2018 को भरकाला, 06 जनवरी 2019 को कूंपाबावड़ी, 12 फरवरी 2019 को रावला बाडिय़ा, 29 अप्रेल 2019 को कालाधड़ा,12 जून 2019 को कूंपा बावड़ी, 13 दिसंबर 2020 को बामनिया जैतपुरा, 11 जनवरी 2021 को सुरडिय़ा, 01 जुलाई 2021 को बेबरा बावड़ी के निकट एक-एक पैंथर मृत मिला।

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