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जोखिम में जननी की जान, घट रही राजस्‍थान की शान

मातृ मृत्यु दर: वैश्विक मानक से राजस्‍थान बहुत पीछे

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जोखिम में जननी की जान, घट रही राजस्‍थान की शान

जोखिम में जननी की जान, घट रही राजस्‍थान की शान

रमेश शर्मा/अजमेर
जन्म के बाद अपने नवजात शिशु को बाहों में लेते हुए किसी भी मां की खुशी का ठिकाना नहीं होता। कुछ महिलाओं के लिए प्रसव का यही अनमोल पल भयावह और यातनाओं भरा होता है। कई अपनी जान गंवा देती हैं, जिसे मातृ मृत्‍यु कहा जाता है। किसी भी देश के नागरिकों की स्वास्थ्य की स्थिति जानने के लिए उस देश का मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) आइना है। चिंता की बात यह है कि राजस्‍थान सर्वाधिक मातृ मृत्‍यु दर वाले देश के चार राज्‍यों में शामिल है। यहां विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के निर्धारित वैश्विक मानक से कहीं अधिक है।
राजस्‍थान में मातृ मृत्यु दर में कमी लाना बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह देश के सबसे पिछड़े चार राज्‍यों में शुमार है। खराब मातृ मृत्‍यु दर के पीछे कई कारण हैं। अधिकतर मामलों में प्रसव के बाद बहुत ज्‍यादा ब्‍लीडिंग से मां की मौत हो जाती है। हालांकि विगत सालों की तुलना करें तो इसमें गिरावट आई है। पिछले वर्ष तत्‍कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने संसद में बताया कि राजस्थान में एमएमआर में 22 अंकों की गिरावट आई। फिर भी यह विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के मानकों से बहुत दूर है।
किसी देश की चिकित्सा सेवा कितनी उत्‍तम और गुणवत्‍तापूर्ण है, इसका अंदाज मातृ और शिशु मृत्यु दर से ही लगाया जाता है। गरीबी, अशिक्षा और अज्ञान इसके लिए जिम्मेदार हैं। चिकित्सक मानते हैं उचित देखभाल से ही इनमें कमी आ सकती है। गर्भाधान में चिकित्सक से मिलकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि मां-शिशु दोनों सुरक्षित हैं। खतरा कितना है। समस्या पर तत्‍काल उपचार, ताकि बाद में कोई अड़चन नहीं हो। स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों के अनुसार प्रसव के दौरान दस फीसदी से अधिक महिलाओं की जान जोखिम में रहती है। इनमें करीब दो फीसदी अत्‍यधिक जोखिम के साथ शिशुओं को जन्‍म देती हैं। इन्‍हीं के स्‍वास्‍थ्‍य की निरंतर निगरानी के लिए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान शुरू किया गया। मातृ मृत्यु दर कम होने का अर्थ है, देश के नागरिकों के स्वास्थ्य की उचित देखभाल हो रही है।
निचला 'पायदान'
राजस्थान (164)
मध्य प्रदेश (173)
उत्तर प्रदेश (197)
असम (215)

ये हो सकते हैं उपाय....
- कोई भी व्यक्ति शासन तक मातृ मृत्यु की सूचना दे सके इसके लिए टोल फ्री नम्‍बर और प्रोत्‍साहन राशि शुरू की जा सकती है। इसकी रिपोर्टिंग में सुधार के लिए उप्र जैसे राज्‍य बेहतर काम कर रहे हैं।
- एएनएम, आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता या कोई अन्य भी मातृ मृत्‍यु की सूचना दें तो चिकित्‍सकों की टीम मातृ मृत्यु के कारणों का पता लगाकर, महिलाओं के बेहतर उपचार व देखभाल के साथ कमी लाने के प्रयास कर सकती है।
जीवन में जोखिम के खास कारण
- 30 प्रतिशत मौतें ज्‍यादा खून बहने।
- उच्‍च रक्‍तचाप, मधुमेह या संक्रमण।
- खराब हायजीन के चलते असुरक्षित गर्भपात।
- खून या अन्‍य पोषक तत्‍वों की कमी।

मातृ मृत्यु दर में काफी हद तक कमी लाई जा सकती है। गर्भ के दौरान महिलाएं पंजीयन जरूर कराएं। नियमित अस्पतालों में जांच, समय पर टीके लगवाएं। प्रसव घरों में नहीं करवाकर अस्पतालों में कराएं। सरकारी योजनाओं के निर्देशों का पालन करें। महिलाओं को जागरूक करने की जरूरत है।
डॉ. महेन्द्र जैन, स्त्री एवं प्रसूती रोग विशेषज्ञ व प्रभारी मातृ एवं शिशु अस्पताल, सवाईमाधोपुर

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