
Heritage buildings in ajmer
रक्तिम तिवारी/अजमेर. पुरा महत्व की सामग्री और धरोहरों को सदियों से खुद में समेटे अजमेर को भी वैश्विक पहचान की दरकार है। हालांकि इसके लिये हर स्तर पर ईमानदार कोशिश की भी उतनी ही जरूरत है। ऐसा किये जाने पर चौहान काल के शहर को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सकती है। अजमेर भी अपनी प्राचीन विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और पुरा महत्व की इमारतों के लिए विख्यात रहा है।
मुगल बादशाह और अंग्रेज अफसरों की जमात में अजमेर का विशेष स्थान था। यहां सदियों पुरानी कई इमारतें, स्मारक, मूर्तियां और कलाकृतियां आज भी मौजूद हैं। उच्च स्तरीय प्रयास किए जाएं तो अजमेर का नाम भी यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल हो सकता है।
राजकीय संग्रहालय
15 वीं शताब्दी में राजकीय संग्रहालय का निर्माण हुआ था। इसका ताल्लुक सम्राट अकबर से रहा है। यहीं बैठकर अकबर-मानसिंह ने हल्दी घाटी युद्ध की रणनीति बनाई थी। 16 वीं शताब्दी में इसी संग्रहालय के झरोखे में बैठकर मुगल बादशाह जहांगीर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत में व्यापार की अनुमति दी थी। जिसके जरिये बाद में अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बना लिया था।
गढ़ बीठली-तारागढ़ का किला
अरावली की पहाड़ी पर 1033 ईस्वी में निर्मित गढ़ बीठली या तारागढ़ को यूरोप का जिब्रॉल्टर भी कहा जाता है। यह किला अपनी बनावट और सुरक्षा के लिहाज से अहम रहा है। किला चौहानों, अफगानों, मुगलों, राजपूतों, मराठों, अंग्रेजों के आधिपत्य में कई युद्धों का साक्षी रहा है। यहां से अजमेर का विहंगम दृश्य दिखता है। राजस्थान पर्यटन विकास निगम किले में स्थित रेलवे डाक बंगले को किराए पर लेकर रेस्टोरेंट-फूड प्लाजा बनाना चाहता है।
आनासागर की खूबसूरत बारादरी
आनासागर पर संगमरमर की खूबसूरत बारादरी बनी हुई है। इसे 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह जहांगीर और शाहजहां ने बनवाया था। यहां से अरावली की खूबसूरती भी नजर आती है।
ब्रिटिशकालीन सर्किट हाउस
बजरंगढ़ से सटी पहाड़ी पर ही सर्किट हाउस बना हुआ है। इसका डिजाइन आधुनिक दिल्ली के वास्तुकार एलन लुटियन्स ने बनाया है। सर्किट हाउस से आनासागर झील, अरावली पहाड़ और अजमेर के निकटवर्ती क्षेत्र दिखते हैं। यह बनावट के मामले में बेमिसाल इमारत है।
डीआरएम कार्यालय
ब्रिटिशकाल में 18वीं शताब्दी में निर्मित डीआरएम कार्यालय वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। संगमरमर से निर्मित भवन में बरसों पुराना लकड़ी का फर्नीचर-सीढिय़ां यथावत हैं। यह तत्कालीन ब्रिटिश इंजीनियरिंग के आधुनिक भवनों में शामिल था।
मेयो कॉलेज
1885 में निर्मित मेयो कॉलेज भी अपनी भव्य बनावट के लिए मशहूर है। ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मेयो इसके संस्थापकों में शामिल थे। यहां मुख्य भवन सहित कोटा हाउस, जोधपुर हाउस, भरतपुर हाउस, बीकानेर पेवेलियन सहित अन्य भवन पारम्परिक राजपुताना शैली में बने हुए हैं।
एसपीसी-जीसीए
1836 में ब्रिटिशकाल में स्थापित सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय कॉलेज भी अंग्रेजों के जमाने की नायाब विरासत है। इनकी बनावट और वास्तुकला देखने लायक है। यह इमारतें भी सौ से 180 साल पुरानी हैं। कॉलेज स्तर पर पुराने भवन में म्यूजियम बनाया जाना प्रस्तावित है।
यह भी बन सकती हैं विरासत
अढ़ाई दिन का झौंपड़ा
चौहान काल में निर्मित अढ़ाई दिन का झौंपड़ा भी नायाब वास्तुकला का उदाहरण है। यहां पत्थरों की बनावट देखने योग्य है। यह तारागढ़ के किले के बाद अजमेर की सबसे पुरानी इमारत है।
यह पुरा सम्पदा भी विख्यात
बादशाह बिल्डिंग नया बाजार, हैप्पी वैली स्थित नूर महल, अजयपाल मंदिर, ढ्डडों की हवेली, लोढा हवेली सहित मदार गेट, ऊसरी गेट, त्रिपोलिया गेट, कोतवाली गेट, दिल्ली गेटइनका कहना है
भव्य पुरा सम्पदा और प्राचीन इमारतों के मामले में अजमेर समृद्ध है। यहां के भवन इंडो-फारसी, ब्रिटिश, मुगल- राजपूत शैली के नायाब उदाहरण हैं। इन्हें देश-दुनिया की नायाब हेरिटेज का दर्जा दिया जाए तो पहचान बढ़ने के अलावा पर्यटन उद्योग को भी फायदा मिलेगा।
प्रो. शिवदयाल सिंह, मदस विवि
इतिहासविद्
Published on:
18 Apr 2022 05:01 pm
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