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‘माननीय’ और ‘श्रीमान’ कहकर किसे संबोधित किया जाए? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया स्पष्ट आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि 'माननीय' और 'श्रीमान' कहकर किसे संबोधित किया जाए?
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प्रयागराज

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Vinay Shakya

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Updated: 5 May 2026, 6:28 PM IST

Allahabad High Court

इलाहाबाद हाई कोर्ट (Image: IANS)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'माननीय' और 'श्रीमान' जैसे शब्दों के इस्तेमाल के लिए अहम टिप्पणी की है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि माननीय और श्रीमान जैसी उपाधि का इस्तेमाल किन लोगों के लिए किया जाए?

'माननीय' या 'श्रीमान' जैसे सम्मान का हकदार कौन?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने UP पुलिस द्वारा BJP सांसद अनुराग ठाकुर के नाम से दर्ज FIR में 'माननीय' या 'श्रीमान' जैसे सम्मानजनक शब्द नहीं लिखे जाने मामले में स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री, सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, लोकसभा-राज्यसभा के अध्यक्ष, राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष तथा सांसद और विधायक इस सम्मानजनक उपाधि का इस्तेमाल करने के हकदार हैं। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने 30 अप्रैल को मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की है। कोर्ट का आदेश 4 मई को अपलोड किया गया है।

कोर्ट ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई को दौरान कोर्ट की बेंच ने कहा- प्रोटोकॉल के अनुसार, अन्य पदाधिकारी भी इस उपाधि का उपयोग करने के हकदार हो सकते हैं। जो भी इस सम्मानजनक उपाधि का हकदार है, उसे उसी प्रकार संबोधित किया जाना चाहिए। कोर्ट ने आगे कहा कि 'माननीय' उपाधि उन संवैधानिक पदाधिकारियों के नाम के साथ जोड़ी जानी चाहिए, जो सरकार के तीनों अंगों (कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) में संप्रभु कार्यों का निर्वहन करते हैं।

हालांकि, किसी भी पदाधिकारी को, चाहे वह कितना भी उच्च पद पर हो, अगर वह केवल सिविल सेवक है और किसी संप्रभु संवैधानिक पद का धारक नहीं है तो उसे इस उपाधि का अधिकार नहीं है। पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा- किसी परिवार से व्यक्तिगत असंतोष या जान-पहचान, किसी संचार के लेखक को सरकार के किसी संप्रभु पदाधिकारी का उल्लेख के बिना अनुमति के करने की छूट नहीं दे सकती।

क्या है पूरा मामला?

मथुरा के हाईवे पुलिस थाने में 21 दिसंबर को हर्षित शर्मा और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई थी। हर्षित पर सरकारी विभागों और मंत्रालय में नौकरी दिलाने के बहाने 80 लाख रुपए ठगने का आरोप लगा था। हर्षित ने अनुराग ठाकुर के साथ अपने घनिष्ठ संबंध होने का दावा किया था। खजान सिंह नामक व्यक्ति ने हिंदी में शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायत को पुलिस ने FIR में फरियादी की द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र के अनुसार, दर्ज किया। इसमे अनुराग ठाकुर को बिना 'माननीय' के संबोधित किया गया था। शिकायतकर्ता ने बाद में अदालत को बताया कि उन्हें सांसदों या पूर्व केंद्रीय मंत्रियों के लिए सम्मानजनक उपाधियों के प्रोटोकॉल की जानकारी नहीं थी।

गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के हलफनामे में बताया गया कि 31 मार्च के अदालती आदेश के बाद 2 अप्रैल को मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को प्रारंभिक जांच शुरू करने के निर्देश दिए गए। हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि अनुराग ठाकुर माननीय सांसद हैं और सम्मानजनक उपाधि के हकदार हैं।

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