
देश के बड़े अर्थशास्त्री ने कहा निराशाजनक रहा बजट, आंकड़ों में उलझाया
प्रयागराज। केंद्र सरकार का आम बजट पेश हुआ। देश भर की नजरें इस बजट पर टिकी रही। राजनीतिक दलों के साथ देशभर के अर्थशास्त्री कारोबारी रोजगार परक सहित बेरोजगार युवाओ को अपने लिए उम्मीद थी। आम बजट किसी भी राष्ट्र के आर्थिक दर्शन के साथ विकास की भावी योजनाओं का दृष्टि पत्र भी माना जाता है । पत्रिका ने बजट आने के बाद देश के जाने माने अर्थशास्त्री प्रोफेसर मनमोहन कृष्णा से बात की उन्होंने इस बजट को आंकड़ों पर आधारित बताते हुए कहा कि पहले के बजट जो सत्ताधारी दल आर्थिक दर्शन होता था।लेकिन यह बजट राजनीतिक पार्टी का प्रचार.प्रसार जैसा लगा। उन्होंने कहा कि डेढ़ घंटे के भाषण में वित्त मंत्री सीतारमण 45 मिनट तक सरकार योजनाओं के बारे में बताती रहीं ।
प्रो मनमोहन कृष्णा के मुताबिक आज के बजट में जिन तीन मुद्दों पर विशेष बात की गई उनमें पहली ग्रोथ रेट, लोगों की आकांक्षाओं, सामाजिक संरक्षण , जिनमें सरकार उन पुरानी योजनाओं के बारे में बताया , जो सरकार पहले से चला रही है। जबकि बजट आने वाले योजनाओं का पिटारा एवं भावी योजनाओं का लेखा- जोखा माना जाता है। उन्होंने कहा कि रेल बजट को भी आम बजट में शामिल किया गया है। लोगों को रेल बजट से उम्मीदें थी। रेल देश में सबसे ज्यादा मध्यवर्ग और निम्न वर्गीय लोगों को प्रभावित करता है। उस पर चंद लाइनों में उसे समेट दिया गया। उन्होंने कहा कि अब सवाल इस बात का है कि रेलवे पीपीपी मॉडल पर चलेगा। उन्होंने रेल के बजट को लेकर निराशा जाहिर की। वही बजट पर डिफेंस बजट को लेकर निराश नजर आये।
प्रो कृष्णा सरकार के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए, कहा कि जब हमारा ग्रोथ रेट कम होता जा रहा है। ऐसे समय में जब महंगाई अपने उच्चतम दर पर पहुंची है। हमारा ग्रोथ रेट 5 अंकों से भी नीचे गिर गया है। जब सबको मालूम है की हम बड़े आर्थिक संकट से जूझ रहे है । ऐसे समय में लोगों को मजबूत आधार की जरूरत है। जो इस बजट में देखने को नही मिला। सिर्फ आंकड़ों में उलझाना यह समझ से परे रहा। प्रोफेसर कृष्णा कहते हैं कि आर्थिक आंकड़ों में जो ईमानदारी होनी चाहिए थी। वह नहीं देखने को मिली।
प्रो ने इस बजट को पूरी तरह आंकड़ों का जाल बताया ।वही स्लैब के बदलाव को भी उन्होंने सही नहीं ठहराया है। प्रो कहते हैं कि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब बचत होती है तब ग्रोथ होती है। इस बजट में युवाओं को खर्च करने का तमाम तरीका बताया ।लेकिन बचाने का तरीका और तमाम तरह की छोटी.छोटी बचत जो महत्वपूर्ण होती है, उससे काफी दूर कर दिया है। प्रोफेसर कृष्णा कहते हैं कि बदलाव के लिए लोगों से सहयोग मांगना चाहिए लोग तैयार भी है। लेकिन इस तरह के बहकावे के साथ आंकड़ों की जाल में लोगों को फसाना ठीक नहीं है ।उन्होंने कहा कि इस बजट की दिशा और दशा उनके समझ से परे रही।
Published on:
01 Feb 2020 09:26 pm
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