
विधानसभा चुनाव में मतदाता के मौन के क्या हैं मायने
विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में चहुंओर प्रत्याशियों के प्रचार का शोर सुनाई पड़ने लगा है, लेकिन मतदान में 9 दिन शेष रहने के बाद भी मतदाता अभी वोट को लेकर मौन साधे है। हालांकि विभिन्न दलों के प्रत्याशी बड़े- बड़े वादे कर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन सबकी सुनने के बाद भी मतदाता अभी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। प्रचार के इस शोर में क्षेत्र के मुददे भी फिलहाल गौण ही नजर आ रहे हैं।
प्रत्याशियों का चुनाव प्रचार अब परवान चढ़ने लगा है। ढोल, डीजे, लाउडस्पीकर का शोर गांव- ढाणियों से लेकर शहर, कस्बों तक सुनाइ पड़ने लगा है। प्रचार अभियान में आने वाले प्रत्याशियों की बात तो मतदाता सुन रहे हैं, लेकिन जवाब किसी को नहीं दे रहे। यही कारण है कि प्रत्याशी और राजनीतिक दल अभी मतदाताओं का मन भांपने में विफल हैं।
मतदाता निभा रहे लोकतंत्र का फर्ज
चुनाव में मतदान गुप्त रखा जाता है, इस कारण लोग मतदान से पहले अपनी मंशा जताने के बजाय मौन साधे हैं। कारण है कि मतदान के बारे में पता चलने पर चुनावी रंजिश की आशंका रहती है, लोग विवादों से बचने के लिए मतदान को लेकर किसी को अपनी मन की बात नहीं बताते।
प्रत्याशी लगा रहे हार- जीत के कयास
मतदाताओं के मुंह नहीं खोलने को लेकर ज्यादातर प्रत्याशी अभी मतदाताओं का रूख अपने पक्ष होने को लेकर कयास लगा रहे हैं। इन्हीं कयास में जातीय आंकड़े फिट कर हार जीत का गणित लगा रहे हैं। लेकिन मतदाताओं के मन की बात पता नहीं चल पाने से प्रत्याशी एवं राजनीतिक दलों की चिंता भी बढ़ रही है। कारण है कि चुनाव प्रचार के दौरान लोगों की भीड़ दिखाई पड़ती है, लेकिन उनके मतदान का रूख का पता नहीं चल पाता।
मुद्दों पर भी नहीं हो रही बात
चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों के प्रत्याशी अपने बड़े नेताओं एवं पार्टी की नीतियों के नाम पर वोट मांग रहे हैं। लेकिन स्थानीय मुद्दों पर बात नहीं हो रही। न प्रत्याशी स्थानीय मुद्दों को लेकर ज्यादा बोल रहे हैं और न ही मतदाता कुछ कह पा रहे हैं। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान कुछ लोग पानी एवं अन्य समस्याओं का जिक्र करते जरूर दिखाई पड़ते हैंं।
Published on:
15 Nov 2023 10:57 pm
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