28 अक्टूबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

एक म्यान में दो तलवार अलवर में ही संभव

आपने म्यान में तलवार तो सुना होगा, लेकिन अलवर संग्रहालय में एक म्यान में दो तलवारें रखी है, जो संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

अलवर

•

image

Jyoti Sharma

•

Updated: 25 Nov 2017, 1:02 PM IST

alwar muesuem has two swords in one sheath

अलवर राज्य के अंतिम शासक तेजसिंह के शासनकाल में अलवर संग्रहालय की स्थापना हुई। सिटी पैलेस की पंाचवी मंजिल में स्थित संग्रहालय देशी विदेशी पर्यटकों के लिए सदा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है। यहां पर दुर्लभ अस्त्र शस्त्र, अमूल्य हस्तलिखित ग्रंथ, राजशाही उपयोगी सामान, वस्त्र, चित्र, सिक्के आदि बेशकीमती सामान प्रदर्शित किया गया है।


जिसकी संख्या लगभग 16 हजार है। यहां प्रदर्शित वस्तुएं इतनी महत्वपूर्ण व दुर्लभ है कि उनका अन्यत्र मिलना ही मुश्किल है। यहां प्रदर्शित सामग्री को तीन विशाल कक्षों प्रदर्शित किया गया है। इस संग्रह को देखकर पर्यटक आश्चर्यचकित रह जाते हैं।


1940 से पहले कहलाता था नुमाइशखाना


महाराजा विनयसिंह ने सन 1847 में पुस्तकालय की स्थापना की। 20 जनवरी 1909 को पुस्तकशाला, सिलहखाना व तोशाखाना की एेतिहासिक सामग्री एवं महत्वपूर्ण कला सामग्री को एकीकृत कर नुमायशखाना विभाग की स्थापना की गई। मुंशी जगमोहन लाल व रामकंवर की देखरेख में सामग्री को प्रदर्शित किया गया। 12 जून 1940 को विधिवत रूप से संग्रहालय की स्थापना हुई।


एक म्यान में दो तलवार


कहावत है कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती, लेकिन अलवर के संग्रहालय में एक एेसी तलवार प्रदर्शित की गई है। जिसमें एक म्यान में दो तलवार रखी हुई है। इसे देखने के लिए दूर दूर से पर्यटक आते हैं। इसके अलावा अस्त्र शस्त्र कक्ष में हजरत अली की तलवार, जिस पर फारसी लेख लिखा हुआ है। तलवार लक्खी, पत्थर काटने वाली तलवार के अलावा अनेक बंदूक, नागफांस, पेशकब्ज, छुरियां, कटारों का बहुत अच्छा संग्रह है।


यशवंत राव होल्कर वेशभूषा


इंदौर के महाराज यशवंत राव होल्कर के द्वारा युद्ध के दौरान पहने जाने वाली वेशभूषा भी यहां प्रदर्शित है। उनसे संबंधित हथियार भी यहां पर प्रदर्शित किया गया। 1803 में लासवाडी के युद्ध में इनकी मौत हो गई।

अलग अलग ढाल


यहां पर एक की जगह पर बहुत सी ढालें प्रदर्शित की गई है। एक ही जगह पर गेंडें की खाल , कछूए की खाल, मगरमच्छ की खाल और मैटल से बनी ढाल प्रदर्शित की गई है। जबकि अन्य संग्रहालय में पर्यटकों को एक या दो तरह की ढाल ही देखने को मिलती है।

चांदी की मेज

हस्तशिल्प कलाकक्ष में प्रदर्शित जर्मन सिल्वर से निर्मित मेज आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय कलाकार नंद किशोर ने चांदी की मेज का निर्माण किया था। इसके नीचे एक यंत्र लगा हुआ है। जिसके संचालन से मेज के ऊपरी भाग पर बनी नहरोंं में मछलियों के जल में तैरने का अहसास होता है। तकनीकी खराबी के चलते अब यह खराब है।

1892 का उल्का पिंड

सन 1892 में अलवर जिले के बानसूर में गिरा आकाशीय उल्का पिंड का खंड भी यहां प्रदर्शित किया गया है। आकाशीय उल्का पिंड जो बाहरी अंतरिक्ष से पृथ्वी के वातावरण में आने से जल जाता