
अलवर में राजनीति फुल, आठ साल में नही बना एक भी पुल
अलवर. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परियोजना में शामिल होने के बाद भी अलवर जिला विकास की दौड़ में सदैव पिछड़ा रहा है। हालांकि अलवर जिले में राजनीति फुल होती रही है, लेकिन बीते आठ साल में विकास के नाम पर अलवर में एक ओवरब्रिज का निर्माण भी नहीं हो पाया है। वहीं बाड़मेर, भरतपुर सहित अन्य छोटे जिले में विकास की रफ्तार अलवर से कहीं तेज है। यह िस्थति तो तब है जब वर्तमान व पूर्ववर्ती राज्य सरकार में अलवर का भरपूर प्रतिनिधित्व रहा है।
राजधानी दिल्ली एवं जयपुर के मध्य िस्थत अलवर जिला विकास के मायने में प्रदेश के अन्य जिलों से पिछड़ा है। जबकि अलवर जिला केन्द्र व राज्य सरकार को जीएसटी, वैट एवं अन्य कर के रूप में दूसरे जिलों से ज्यादा राजस्व देता रहा है। अलवर जिले में आज भी कई ऐसे स्थान, रेलवे फाटक तथा दुर्घटना के स्थल हैं, जहां ओवरब्रिज या अंडरब्रिज निर्माण की शीघ्र आवश्यकता है
अलवर में आठ साल में एक भी पुल नहीं बना
अलवर जिले के विकास की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से सहज लगाया जा सकता है कि जिला मुख्यालय पर बीते आठ साल में एक भी ओवरब्रिज या अंडर ब्रिज का निर्माण नहीं हो सका। अलवर में कालीमोरी ओवरब्रिज भी वर्ष 2013-14 से पूर्व ही स्वीकृत हुआ, जिसका उद्घाटन वर्ष 2016 में हुआ। वहीं अग्रसेन चौराहा िस्थत ओवरब्रिज की डबल लेन भी इसी दौरान डाली गई। इसके बाद जिला मुख्यालय पर कोई ओवरब्रिज स्वीकृत नहीं हुआ। इस दौरान काली मोरी फाटक पर अंडर ब्रिज स्वीकृत तो हुआ, लेकिन उसका निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है। वहीं राजगढ़ कस्बे के बांदीकुई मार्ग स्थित रेलवे फाटक 142 पर ओवरब्रिज का निर्माण कार्य अभी चल रहा है।
बाड़मेर में एक नहीं, कई पुल बन गए
कभी प्रदेश के पिछड़े जिलों में शुमार बाड़मेर विकास की दौड़ में अलवर से कई गुना आगे हैं। वहां बीते 5- 7 सालों में करीब आठ ओवरब्रिज का निर्माण हो चुका है। इसी तरह भरतपुर में करीब पौने चार सौ करोड़ रुपए लागत से ड्रेनेज सिस्टम की डीपीआर अंतिम चरण में हैं। यहां आरयूआईडीपी से ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण कराने की तैयारी है। इसी तरह भौगोलिक व राजनीतिक दृष्टि से अलवर से पिछड़े चूरू, अजमेर, नाथद्वारा सहित अन्य कई जिलों में विकास के कार्य बड़े पैमाने पर कराए गए हैं, या फिर इन जिलों के लिए आरयूआइडीपी व अन्य विकास की संस्थाओं के माध्यम से बड़े विकास कार्यों के प्रस्ताव या डीपीआर तैयार कराई जा रही है।
राज्य सरकार में रहता है अलवर का दबदबा
राज्य सरकार में अलवर का दबदबा रहा है। वर्तमान सरकार में अलवर जिले से दो कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में भी अलवर जिले से दो कैबिनेट मंत्री रहे हैं। इससे पूर्व भी राज्य सरकार में जिले से मंत्री रहे हैं। इसके अलावा केन्द्र में सत्तारूढ़ दल से सांसद रहे हैं। कांग्रेस की राजनीति में भी अलवर की अच्छी पकड़ रही है।
विकास के प्रस्ताव ही नहीं, सोच भी नहीं बन पा रही
अलवर जिले के विकास की दौड़ में पिछड़ने का बड़ा कारण यह रहा कि यहां विकास की योजनाओं के प्रस्ताव ही नहीं बन सके। इतना ही राजनीति में फुल रहने के बाद भी यहां विकास की सोच भी नहीं बन पा रही है। जबकि आरयूआइडीपी जैसी बड़ी संस्थाओं में विकास कार्यों के प्रस्ताव व डीपीआर तैयार कर भेजने तथा राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर अलवर जिले के विकास के लिए बड़ी राशि स्वीकृत कराई जा सकती है। प्रदेश के जयपुर, कोटा, उदयपुर, जोधपुर, अजमेर आदि जिले राजनीतिक प्रभाव के चलते विकास के बड़े प्रोजेक्ट हांसिल करने में कामयाब रहे हैं।
रोप वे प्रस्ताव भी नहीं ले सका मूर्तरूप
कुछ वर्ष पहले यूआईटी की ओर से अलवर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बालाकिला क्षेत्र में रोप वे निर्माण का प्रस्ताव तैयार किया, तत्कालीन यूआईटी अधिकारियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकृति की स्टेज तक पहुंचा दिया, लेकिन बाद में इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यदि अलवर में रोप वे का निर्माण हो पाता तो बड़ी संख्या में लोगों को पर्यटन क्षेत्र में रोजगार मिलता।
कई जिलों में स्मार्ट सिटी के बन रहे प्रस्ताव, यहां सोच का भी अभाव
इन दिनों प्रदेश में कई जिलों में स्मार्ट सिटी को लेकर प्रस्ताव व डीपीआर तैयार की जा रही है। इनमें बड़े जिलों के साथ ही कई छोटे जिले भी शामिल हैं, लेकिन अलवर में अभी स्मार्ट सिटी को लेकर सोच ही नहीं बन पाई है।
Published on:
18 Apr 2022 09:26 pm
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