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अलवर वासियोंं को बहुत याद आ रही है मटके वाली प्याऊ, सडक़ों से हो गई है गायब

अलवर में लगभग हर सडक़ पर दिखने वाली मटके की प्याऊ अब गायब हो गई है।

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अलवर

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Prem Pathak

Jun 06, 2018

Alwar people missing pot drinking water place on roads

अलवर वासियोंं को बहुत याद आ रही है मटके वाली प्याऊ, सडक़ों से हो गई है गायब

अलवर. तेज धूप में सूरज की चुभती किरणें , ऐसे में पैदल चलना किसी और प्यास लगे तो पानी नहीं मिले तो यह किसी सजा से कम नहीं। इन दिनों जिले में भीषण गर्मी का दौर जारी है और ऐसे में अलवर शहर के सभी प्रमुख मार्गों पर दूर-दूर तक प्याऊ दिखाई नहीं पड़ती। किसी समय पग-पग लगने वाली कोरे मटके के पानी वाली प्याऊ तो मानो अब कल्पना मात्र रह गई हैं।
शहर के भवानी तोप से मोतीडंूगरी, रेलवे स्टेशन से बिजली घर चौराहा, इटाराणा रोड से रेलवे स्टेशन तक दूर- दूर तक प्याऊ दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि इन मार्गों पर गर्मी में लोग पीने के पानी के लिए परेशान होते देखे जा सकते हैं।

मटके वाली प्याऊ की रह गई सिर्फ यादें

आज जगह जगह पर वाटर कूलर लग गए हैं। पानी की प्याऊ पर नल की टुटियां लगी हुई है। प्याऊ में टैंकरों से पानी डलवाया जाता है। जिसे राहगीर पीते हैं। बहुत से लोग सुविधा के लिए पानी के कैंपर भी रखने लगे हैं । लेकिन जो बात प्याऊ के ठंडे और शीतल जल में हैं वो इनमें नजर नहीं आती है। मटके वाली प्याऊ पर बैठी महिला को जब अम्मा कहते हैं तो उसके मुंह से दुआं निकलती थी।

पानी पिलाने का धार्मिक महत्व

इंसान शुरु से ही दान पुण्य कर अपने लिए मोक्ष कमाने की कोशिश करता रहा है। विशेष तिथियों व विशेष अवसरों पर पानी की प्याऊ पर पानी पीलाने के लिए पहले लोगों में होड़ रहती थी। पुरुषोत्तम मास, निर्जला एकादशी, गंगा दशहरा, जगन्नाथ जी के मेले के अलावा अलवर शहर में गर्मियों के दौरान हर जगह प्याऊ चलती थी। पानी पिलाने से पुण्य मिलता है इसलिए बुजुर्ग लोग कुओंं से जल लाकर स्वयं मटकों में भरते थे, या फिर मटके भर के प्याऊ पर रखते थे। बहुत कम खर्च और कम मेहनत में राहगीर को ठंडा पानी मिल जाता और वह प्याऊ चलान वालो को दुआएं देता ।

यहां चलती थी प्याऊ

मटके वाली प्याऊ अब हमारी यादों का हिस्सा बन गई हैं। अब शहर में ही नहीं गांवों में भी मटके वाली प्याऊ नहीं दिखती। मटके में रखा ठंडा पानी एक बार पीते ही प्यास बुझ जाती थी, लेकिन अब पानी पीने के बाद भी लगता है कि हम प्यासे रह गए। अब मटके की जगह मशीन ने ले ली है। जहां वाटर कूलर में ठंडा पानी तो मिलता है।

अब हर जगह दिखते हैं वाटर कूलर

शहर के विवेकानंद चौक पर पुरुषार्थी धर्मशाला के सामने बनी प्याऊ, पुराना कटला में दरवाजा के अंदर बनी प्याऊ, सर्राफा बाजार में बनी प्याऊ , अशोका टाकीज से लादिया रोड पर रामनारायण ठेेकेदार के कार्यालय पर बनी प्याऊ आदि बहुत सी प्याऊ अब बंद हो चुकी है। यहां अब भी प्याऊ के लिए बनाई गई खिडक़ी बनी हुई है लेकिन वह भी इतिहास बन गई क्योंकि वह बंद ही रहती है।