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नाहवणी नदी के तट पर भाड़ा सिंह ने बसाया भांडा माजरी गांव

623 वर्ष पूर्व बसा गांव, शिव मंदिर है आस्था का केन्द्र

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नाहवणी नदी के तट पर भाड़ा सिंह ने बसाया भांडा माजरी गांव

नाहवणी नदी के तट पर भाड़ा सिंह ने बसाया भांडा माजरी गांव

अलवर. जिले के मुंडावर कस्बे से करीब 11 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में स्थित गांव माजरी भांडा की पहचान जगन्नाथ से होती है। जगन्नाथ अफगानिस्तान के राजा रहे गजसिंह के जागीरदार रहे हैं। नाहवणी नदी के तट पर बसा 300 घरों की बस्ती करीब 623 वर्ष पूर्व भाड़ा सिंह के द्वारा बसाया गया।
राजा गजसिंह के यहां हाथियों का लालन पालन करने वाले लोग तेहन गढ़ दिल्ली के आस पास आकर बस गए जो ठाकुर जाति के थे। बाद में गजराज गोत्र के जाट बन गए। जागा बही के अनुसार तेहन गढ़ को तहन पाल ने बसाया था जो मथुरा के आसपास का क्षेत्र है। बताया जाता है कि तेहनगढ़ में पहल राज नाम का बुजुर्ग के पूर्वज शामदा गांव में आकर बस गय थे। जो सोडावास कि दक्षिण पूर्वी दिशा में स्थित गांव है । शामदा गांव के शिव मंदिर देखने योग्य जगह है। शामदा ग्राम के ब्राह्मण आज भी गांव में रक्षा सूत्र बांधने व विवाह शादियों में काम करने आते हैं।पहल राज की संतानों में जगमाल शामदा छोडक़र पाटन खेड़ा आकर बस गए थे। पाटन खेड़ा किसी समय स्वरूप सराय और मुंडिया खेड़ा के बीच कच्चे घरों की बस्ती थी और नहावनी नदी मूंडियाखेड़ा और राजवाड़ा के बीच से बहती थी। वहां आज भी कालरा जोहड़ है।
अभी हैं भीमाराम के रहने के अवशेष

जगमाल के पुत्र का नाम भीमा राम था के पुत्र करमचंद के पुत्र उदयराम के पुत्र जगन्नाथ हुए। जो पाटन खेड़ा में रहते थे। जिनके यहां रहने के प्रमाण के रूप में मिट्टी के बर्तन, कुम्हार का आवा और श्मशान भूमि की राख देखने को मिलती है। किवदंन्ति के अनुसार एक बार बाढ़ आई। जिसमें पाटन खेड़ा गांव बह गया और नदी ने भी अपना रास्ता बदल लिया। और भांडा ने अपना नया गांव विक्रम सम्वत 1454 में गांव माजरी भांडा को बसाया था। भांडा नें ही इस गांव का नामकरण किया। बताया जाता है कि भाड़ा के आशा उर्फ पन्ना हुए। जिन्होंने गांव के उत्तर दिशा में बाबा भोमिया की स्थापना की।
गांव में 80 प्रतिशत आबादी जाटों की
इस गांव में 80 प्रतिशत जाति जाट जाति के लोग रहते हैं जो गजराज गोत्र के है और शेष 20 प्रतिशत अन्य जातियों के लोग रहते हैं।
स्कूल एवं सडक़ का अभाव
यहां के युवा शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे हैं। लेकिन सरकार की अनदेखी के कारण यहंा आज भी यह राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय ही है। यहंा के निवासी लगभग 100 सैनिक है। जो देश सेवा कर रहे हैं। देश की अलग-अलग सीमाओं पर कार्यरत है। गांव में स्वास्थ्य केंद्र व पशु चिकित्सालयों का अभाव ग्रामीणों को काफी अखर रहा है। गांव में मौजूद विशाल हनुमान जी का मंदिर में हर वर्ष भंडारा का आयोजन कर पुण्य कमाया जाता है। ग्रामीणों को पंचायत हेड क्वार्टर राजवाड़ा तक के 2 किलोमीटर मार्ग पर आज तक डामरीकरण नहीं होने का काफी मलाल है।

गांव में पानी का मुख्य स्रोत था नदी गांव में पानी का मुख्य स्रोत था नदी
प्राचीन समय में जल स्रोत मुख्य रूप से नदी थी। बाद में रजा ठाकुर ने गांव में रोजा वाला कुआं बनवाया। इसी तर्ज पर गांव के नत्थू ठाकुर ने भी अपना अलग से नया कुआं बनवाया जो आज भी गांव में नत्थू ठाकुर एवं रजा ठाकुर के नाम से विख्यात है।
लोगों का मुख्य धंधा कृषि प्रधान
कहते हैं कि यहा से ठाकुरों ने पलायन कर हासपुर गांव बसा लिया। गांव के बुजुर्ग महेन्द्र चौधरी के अनुसार गांव के बुजुर्गों ने 60 बीघा ब्राह्मणों को जमीन दान में देकर चंद्र की ढाणी बसाई और 18 बीघा जमीन दान में सेडिया नाम के पंडित सरूप सराय को दान में दी। इस गांव में लगभग पंद्रह सौ बीघा जमीन है। जिसमें ग्यारह सौ बीघा जमीन सिंचाई योग्य है। बाकी चार सौ बीघा जमीन नदी नालों की है। यह गांव कृषि प्रधान है।

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