
पुलिस व गोतस्करों के लिए बड़े मुनाफे का सौदा है गोतस्करी, सांठगांठ से चलता है गोतस्करी का खेल
राजस्थान का सिंह द्वार धीरे-धीरे गोतस्करी के मुख्य द्वार में तब्दील होता जा रहा है। आए दिनों गोतस्करी के बढते मामलों ने सिंहद्वार की साख को बट्टा लगा दिया है। गोतस्करी के इस खेल से जुडे लोग मोटे मुनाफे के चक्कर में इस काम को अंजाम दे रहे है। कई लोग तो इसे आजीविका बना बैठे हैं।
गोतस्करी के इस खेल में गोशाला के कर्मचारियों से मिलीभगत कर रखी है। इसके आवारा गोवंश को भी शिकार बनाया जाता है। गोतस्करी के लिए 4 से 5 गोतस्कर रात के करीब 11 से 12 बजे के बीच रोटी लेकर निकलते हंै और आवारा गायों को डालते हैं। रोटी के लिए जब गायें एक जगह एकत्रित हो जाती हैं, तो गोतस्कर उन्हें गाड़ी में भर लेते हैं। गोतस्करों ने कई थानों में मासिक बंधी भी बंधी होती है। जिन थानों या चौकियों से यह बंधी तय नहीं हो पाती वहां चोर रास्तों का सहारा लिया जाता है।
नम्बर प्लेट होती है फर्जी
एक बार गोतस्करी में उपयोग की गई गाड़ी को या तो दोबारा गोतस्करी के लिए नहीं ले जाया जाता और अगर ले जाया जाता है तो उस पर दूसरा रंग कर नम्बर प्लेट बदल दी जाती है। गोतस्करी के लिए उपयोग की गई गाड़ी को चलाने के लिए गाय की गाड़ी के एक चक्कर में चालक को 10 से 20 हजार रुपए की राशि मेहनताने के रूप में दी जाती है। वहीं गाड़ी में गोवंश को लोड करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को 2 से 5 हजार रुपए दिए जाते हैं। गोतस्करी के जुड़े लोग गाय के मांस को सौ रुपए किलोग्राम के हिसाब से बेचते है और एक गाय की खाल की कीमत लगभग 1200 से 1500 रुपए तक होती है । इस प्रकार एक गाय की कीमत 11 से 15 हजार रुपए होती है।
गौतस्करी के चोर रास्ते
गोतस्कर रामगढ-लंलावडी-अलावड़ा-चौमा-शेरपुर होते हुए हरियाणा में प्रवेश करते हैं। अलावलपुर से झण्डाखेडी एवं मूनपूर करमला होते हुए हरियाणा के कोलगांव में आसानी से गोतस्करों का प्रवेश होता है। शेरपुर गांव से गोलकी के कच्चे रास्ते हरियाणा के भूड की नंगली से गोतस्करी का धंधा होता है।
Published on:
25 Jul 2018 11:33 am
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