15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

वर्ष 1939 में हुई थी अलवर में प्रजामंडल की स्थापना, गांव-गांव घूमकर बताया था आजादी का मतलब

जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र आता है, उसमें अलवर की भागीदारी को दरकिरनार कर पाना संभव नहीं रहता।

4 min read
Google source verification

अलवर

image

Prem Pathak

Aug 15, 2017

Freedom : Alwars contribution to the freedom struggle

Freedom : Alwars contribution to the freedom struggle

प्रेम पाठक. अलवर.

स्वतंत्रता संग्राम में अलवर का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। यहां आजादी की अलख प्रजामंडल ने जगाई और इस जोत को देश की स्वतंत्रता मिलने तक अनवरत गतिमान बनाए रखा। इस दौर में आंदोलन की अगुवाई कर रहे कुछ नेताओं को जेल तक की यात्रा कर यातनाएं सहनी पड़ी तो, कई दिन-रात गांव-गांव घूम लोगों में आजादी की अलख जगाते रहे। यही कारण है कि जब भी देश के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र आता है, उसमें अलवर की भागीदारी को दरकिरनार कर पाना संभव नहीं रहता।

यूं तो स्वतंत्रता संग्राम में राजस्थान (तत्कालीन राजपूताना) का बड़ा योगदान रहा है। सन् १८५७ से आजादी प्राप्त होने १९४७ तक चले आजादी के लंबे संघर्ष में अलवर जिले के कई वीर सपूतों ने पराक्रम दिखाते हुए जान की बाजी लगाई।

ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सन् १८५७ की क्रांति में भी अलवर के वीर सपूतों ने भागीदारी निभाई। इनमें अलवर के सूबेदार चिम्मनसिंह भाटी ने नसीराबाद छावनी के विद्रोह में एक अंग्रेज को मार गिराया। वहीं स्वतंत्रता सेनानी पं. लक्ष्मण स्वरूप त्रिपाठी के चचेरे दादा कर्ण त्रिपाठी ने मेरठ छावनी सशस्त्र विद्रोह में भूमिका निभाई। इनके अलावा भी कई अन्य वीर सपूतों ने इस दौर में अंग्रेजों से लोहा लिया, लेकिन अलवर जिले में आजादी की असल अलख वर्ष १९३९ में प्रजामंडल के गठन के बाद जगी।

भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित हुआ प्रजामंडल


महात्मा गांधी ने ८ अगस्त १९४२ को कांग्रेेस की मुम्बई बैठक में भारत छोड़ो आंदोलन का एेलान किया। उसी दिन एक अन्य बैठक में महात्मा गांधी ने देशी राज्यों के प्रजामंडलों के नेताओं को अपने-अपने शासकों को पत्र लिखकर ब्रिटिश सार्वभौमिकता से संबंध तोडऩे की मांग करने का सुझाव दिया। इसी सुझाव पर अलवर में प्रजामंडल की ओर से कार्य योजना तैयार की गई। अलवर राज्य में सामंतशाही थी, फिर भी जागरुक नागरिकों व अलवर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की सहानुभूति आंदोलन के प्रति थी। कांग्रेस व प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं ने गुप्त रूप से पटरियों पर बैठक कर आंदोलन को सक्रिय सहयोग देने का निर्णय किया। बाद में महात्मा गांधी ने सन् १९४३ में पूना के आगाखां महल में २१ दिनों की भूख हड़ताल की घोषणा की। इसका बाबू शोभाराम पर जादुई प्रभाव पड़ा और वे आठ दिन बाद ही भूख हड़ताल पर बैठ गए। उनकी भूख हड़ताल १३ दिन चली और महात्मा गांधी की हड़ताल के साथ ही टूटी। इस घटना से शोभाराम सर्वप्रिय नेता के रूप में उभरे। इन दिनों सामंतशाही से मुक्ति के लिए अलवर की जनता में जुनून सा छा गया और वे प्रजामंडल को सुदृढ़ करने में जुट गए।

यह रहा प्रजामंडल का स्वाधीनता संग्राम का सफर


प्रजामंडल के विस्तार के लिए बाबू शोभाराम ने गांव-गांव साथियों के साथ दौरा कर सभाएं की। इसका असर यह हुआ कि जनता का मनोबल ऊपर उठा। प्रजामंडल के सदस्य सामंतशाही के नुमाईंदे व पुलिस की ओर से अन्याय वाले स्थानों पर पहुंचते। इस दौर में प्रजामंडल के नेतृत्व में राजनीतिक गतिविधियों को सिलसिला शुरू हुआ। वर्ष १९४३ से जिले में आंदोलन जोर पकडऩे लगा। शोभाराम के साथ मास्टर भोलानाथ, लाला काशीराम, फूलचंद गोठडि़या एवं अन्य कार्यकर्ता भी अलख जगाने में जुटे थे। उन्हीं दिनों रामजीलाल अग्रवाल भी कानपुर, इंदौर आदि स्थानों पर छात्र व मजदूर आंदोलनों का अनुभव लेकर लौटे प्रजामंडल के सहयोग में जुट गए। वर्ष १९४४ में गिरधर आश्रम में राजस्थान व मध्य भारत की रियासतों के प्रजामंडल कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हुआ। इनमें लोकनायक जयप्रकाश नारायण, गोकुल भाई भट्ट जैसे बड़े नेता आए। अब जब भी कहीं प्रजा पर जुल्म हुआ, विरोध का स्वर मुखर हुए। प्रजामंडल ने जागीर माफी जुल्म, कस्टम टैक्स, तंबाकू पर टैक्स, उत्पादन पर बढ़े कर, वारफण्ड की जबरन वसूली, पुलिस व राजस्व अधिकारियों की ज्यादती के विरोध में आंदोलन किए। इस कार्य में कृपादयाल माथुर, रामचंद्र उपाध्याय व अन्य कार्यकर्ताओं को साथ मिला। इसी तरह थानागाजी में तहसीलदार रिश्वतखोरी मामले का भी प्रजामंडल ने विरोध किया। इस आंदोलन में पं. हरिनारायण शर्मा, लक्ष्मीनारायण खंडेलवाल व अन्य लोग थानागाजी पहुंचे और सभा की।

खेड़ा मंगलसिंह में जलसे पर रोक का विरोध


खेड़ा मंगलसिंह में जलसा नहीं होने देने पर एक फरवरी १९४६ की रात को शोभाराम, रामजीलाल अग्रवाल, लाला काशीराम व भवानीसहाय शर्मा को सोते हुए पुलिस ने वारंट के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के बाद भी गांव में सभा हुई। इसके अलावा भी प्रजामंडल की ओर से अलवर जिले में नव जनजागरण के कार्य किए गए।

अलवर में दो तरफा थी सत्ता


जिले में दो तरफा सत्ता थी, इनमें एक ब्रिटिश सरकार व दूसरी राजशाही परिवार की। अलवर की राजशाही ब्रिटिश सरकार के अधीन थी। इस कारण ब्रिटिश सरकार का जिले में सीधे तौर पर ज्यादा हस्तक्षेप नहीं रहा, लेकिन राजशाही परिवार की निरंकुशता लोगों को कचौटने लगी। इसी का परिणाम था कि आजादी आंदोलन के दौर में अलवर जिले में नीमूचाणा किसान हत्याकांड, मेव किसानों का आंदोलन, खेड़ा मंगलसिंह सहित अन्य आंदोलन को यहां के किसान व अन्य लोग मजबूर हुए। राजशाही की यह निरंकुशता ही जिले में आजादी की अलख जगा गई। इस अलख को परिणाम तक पहुंचाने में प्रजामंडल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रजामंडल में विलय हुआ था कांग्रेस का


अलवर जिले में कांग्रेस की स्थापना सितम्बर १९३७ में मन्नी का बड़ स्थित महादेव मंदिर में हुई थी। वर्ष १९३८ में राज्य में पहली बार सरकार ने छात्रों पर चार आना मासिक फीस लगाने की घोषणा की। कांग्रेस ने सरकार की इस घोषणा का विरोध कर गिरफ्तारियां दी। बाद में वर्ष १९३९ ई. में मोदी नत्थूराम के घर प्रजामंडल की स्थापना हुई। कुछ समय तक कांग्रेस और प्रजामंडल नाम से दो अलग-अलग संस्थाएं चलती रही, बाद में कांग्रेस के उच्च नेताओं के परामर्श पर अगस्त १९४० ई. में कांग्रेस को प्रजामंडल में विलीन कर दिया गया। इसी वर्ष संस्था विधिवत पंजीकृत भी हो गई।

ये भी पढ़ें

image