
महाराज जयसिंह ने बनवाया अलवर में गंगा का मंदिर
अलवर शहर में दिल्ली दरवाजा स्थित गंगा मंदिर में 27 मई 1932 को गंगा माता की मूर्ति का प्रतिष्ठा समारोह आयोजित हुआ। जिसमें अलवर के पूर्व महाराजा जयसिंह भी शामिल हुए। 28 मई 1932 को पूर्व अलवर रियासत के अलवर गजट में भी इसका जिक्र किया गया है।
इतिहासकार हरिशंकर गोयल ने बताया कि यह मंदिर सबसे प्राचीन गंगा मंदिर में शामिल है। रैदास जाति का इस मंदिर से जुड़ाव रहा है, लेकिन यहां होने वाली रविदास जयंती के कार्यक्रमों में सभी जाति धर्म के लोग उत्साह से शामिल होते थे। क्योंकि गंगा माता की मान्यता सभी हिंदू समाज और जातियों में है। विशेषकर पिछड़े और दलित वर्ग में गंगा की सौगंध से बहुत सारे निर्णय पंच-पटेल लेते थे। गंगा माता की सौंगंध झूठे रूप में लेने पर दंड भी दिया जाता था।
17 दिसंबर 1932 को पूर्व महाराजा जयसिंह ने बनारस विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में सनातन धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला। जब वे अलवर लौटे तो उस समय उन्होंने राम नाम का दुपट्टा पहन रखा था और नंगे पैर रेलवे स्टेशन से गंगाजी के मंदिर में गए थे। उन्होंने 30 अप्रेल 1933 में गंगा माता के दरबार का आयोजन किया और स्वदेशी वस्त्र धारण किए। 22 मई 1933 को वस्त्र धारण कर अंग्रेजों के देश निकाले पर अलवर रियासत छोड़ दी और 16 जून 1933 को इंग्लैंड चले गए। पुन: अलवर रियासत में नहीं आए।
पूर्व महाराजा जयसिंह भगवान राम के परम भक्त थे, साथ ही वें गंगा माता को बहुत मानते थे। इतिहासकार गोयल ने बताया कि पहले रविदास जयंती पर शहर के गणेश बाजार में लड्डू बांटे जाते थे, लेकिन अब यहां पर भंडारा होने लगा है। होपसर्कस पर पहले इतनी अधिक भीड़ नहीं रहती थी। गांव से शहर आने के साधन नहीं होते थे। इसलिए शहर के लोग ही इसमें शामिल होते थे, लेकिन अब ग्रामीण क्षेत्र से भी लोग जयंती में शामिल होते हैं।
Published on:
15 Feb 2022 10:06 pm
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