अलवर

हनुमान जयंती विशेष : राजस्थान में यहां हनुमान जी ने तोड़ा था गदाधारी भीम का घमंड, बाद मे दिए थे दर्शन, आज है आस्था का केन्द्र

महाबली हनुमान ने भीम का घमंड तोड़ दिया था, इसके बाद जब बजरंगबली ने दर्शन दिए तो पांडवों ने उनका मंदिर बनवाया।

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Apr 19, 2019
हनुमान जयंती विशेष : राजस्थान में यहां हनुमान जी ने तोड़ा था गदाधारी भीम का घमंड, बाद मे दिए थे दर्शन, आज है आस्था का केन्द्र

रामायण काल बजरंग बली की वीरता के कई किस्से हैं। उनके बल से दानव थर-थर कांपते थे। रामायण काल के बाद महाभारत काल में भी उन्होंने दर्शन दिए थे। महाभारत काल में हनुमान ने पांडु पुत्र भीम को दर्शन दिए थे।
किंवदति है कि जब पांडव कौरवों से जुआं में सब कुछ हार गए थे तब कौरवों ने पांडवों को 13 वर्ष के लिए हस्तीनापुर से निष्कासित कर 12 वर्ष ज्ञात एवं 1 वर्ष अज्ञातवास व्यतीत करने को भेजा तो पांडवों ने इसके निर्वहन के लिए अलवर जिले के वन क्षेत्र को चुना। इसके बाद पांडव सरिस्का की पर्वतमालाओ में ही रहकर अपना समय व्यतीत करने लगे थे। यह वन क्षेत्र अब सरिस्का के नाम से मशहूर है।
महाभारत काल की एक घटना के अनुसार इसी अवधि में द्रौपदी अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार इसी घाटी के नीचे की ओर नाले के जलाशय पर स्नान करने गई थी । एक दिन स्नान करते समय नाले में ऊपर से जल में बहता हुआ एक सुन्दर पुष्प आया द्रोपदी ने उस पुष्प को प्राप्त कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उसे अपने कानों के कुण्डलों में धारण करने की सोची। स्नान के बाद द्रोपदी ने महाबली भीम को वह पुष्प लाने को कहा तो महाबली भीम पुष्प की खोज करता हुआ जलधारा की ओर बढऩे लगा। आगे जाने पर महाबली भीम ने देखा की एक वृद्ध विशाल वानर अपनी पूंछ फैला आराम से लेटा हुआ था। वानर के लेटने से रास्ता पूर्णतया अवरुद्ध था ।

यहां संकरी घाटी होने के कारण भीमसेन के आगे निकलने के लिए कोई ओर मार्ग नही था। भीमसेन ने मार्ग में लेटे हुए वृद्व वानर से कहा कि तुम अपनी पूंछ को रास्ते से हटाकर एक ओर कर लो तो वानर ने कहां कि मै वृद्व अवस्था में हूं। आप इसके ऊपर से चले जाएं, भीम ने कहा कि मैं इसे लांघकर नहीं जा सकता, आप पूंछ हटाएं। इस पर वानर ने कहा कि आप बलशाली दिखते हैं, आप स्वयं ही मेरी पूंछ को हटा लें। भीमसेन ने वानर की पूंछ हटाने की कोशिश की तो पूंछ भीमसेन से टस से मस भी ना हो सकी। भीमसेन की बार बार कोशिश करने के पश्चात भी भीमसेन वृद्ध वानर की पूंछ को नही हटा पाए और समझ गए कि यह कोई साधारण वानर नही है । भीमसेन ने हाथ जोड़ कर वृद्ध वानर को अपने वास्तविक रूप प्रकट करने की विनती की । इस पर वृद्ध वानर ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर अपना परिचय हनुमान के रूप में दिया । भीमसेन ने सभी पांडव को वहां बुला कर वृद्ध वानर की लेटे हुए रूप में ही पूजा अर्चना की। इसके बाद पांडवों ने वहां हनुमान मंदिर की स्थापना की जो आज पांडुपोल हनुमान मंदिर नाम से मशहूर है। अब हर मंगलवार व शनिवार को यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं, मंदिर जन-जन की आस्था का केन्द्र है।

Published on:
19 Apr 2019 12:14 pm
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