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अलवर जंक्शन के पास महाराजा जयसिंह ने बनवाया था महाराजा स्टेशन, अब इस ऐतिहासिक विरासत पर लगा ग्रहण

अलवर जंक्शन के पास अलवर के पूर्व शासक जयसिंह ने लाल पत्थर से महाराजा स्टेशन का निर्माण कराया था, लेकिन अब इसकी हालत खराब हो रही है।

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अलवर

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Hiren Joshi

Feb 14, 2019

Maharaja Station Near Alwar Junction

अलवर जंक्शन के पास महाराजा जयसिंह ने बनवाया था महाराजा स्टेशन, अब इस ऐतिहासिक विरासत पर लगा ग्रहण

अलवर. कभी अलवर की शान रहा महाराजा स्टेशन संरक्षण के अभाव में अपनी आभा को खोने लगा है। 19 वीं शताब्दी के प्रारंभ में लाल पत्थरों पर विशेष नक्काशी कर बनाए महाराजा स्टेशन की दशा इन दिनों ऐतिहासिक विरासत पर ग्रहण के समान दिखाई पड़ती है।

देश-विदेश सहित अलवर के पूर्व शासक जयसिंह ने महाराजा स्टेशन का निर्माण कराया। लाल पत्थरों पर नक्काशी कर बनाया गया यह स्टेशन उस दौरान दूरदराज की रियासतों में अलवर की शान माना जाता है। पूर्व रियासतकाल में निर्मित होने के कारण इसका नामकरण भी महाराजा स्टेशन के नाम से किया गया। इस भवन की भव्यता ऐसी थी कि महाराजा स्टेशन के बाहर सडक़ पर जाने वाले हर व्यक्ति उसे निहारे बिना आगे बढ़ ही नहीं पाता था। इतना ही नहीं अन्य रियासतों के शासक व मेहमान इसकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते।

विरासत बचाने की चिंता किसी को नहीं

शहर की ऐतिहासिक विरासत को बचाने की चिंता किसी में नजर नहीं आती। न सरकार को इस ऐतिहासिक विरासत से कोई सरोकार दिखाई पड़ता है और न ही रेलवे एवं प्रशासन को। यही कारण है कि महाराजा स्टेशन परिसर को जहां भी मरम्मत की जरूरत हुई, वहीं जिम्मेदारों ने काम चलाऊ मरम्मत कर इसकी भव्यता में बदरंगनुमा दाग छोडऩे में कसर बाकी नहीं रखी। पिछले महीनों इस परिसर की चारदीवारी का निर्मार्ण कराया गया, लेकिन उस निर्माण का इसी ऐतिहासिकता से दूर का भी वास्ता नहीं दिखा। साधारण तरीके से पत्थरों से चिनाई कर दीवार तो बना दी, जबकि जिम्मेदार विभाग को उस स्थान पर वही लाल पत्थर से ऐतिहासिकता लिए दीवार का निर्माण कराना चाहिए था। यही कारण है कि अलवर की यह ऐतिहासिक विरासत संरक्षण के अभाव में जीर्णशीर्ण हालत में पहुंचने लगी है।

और अब महाराजा स्टेशन के हालात क्या?

वैसे तो महाराजा स्टेशन अब भी अलवर रेलवे जंक्शन का हिस्सा है। महाराजा स्टेशन भवन पर लाल पत्थर व नक्काशी किए दरवाजे व मुंढेर इसकी भव्यता की कहानी को दोहराती प्रतीत होती है, लेकिन इसके बाहर खुदी सडक़, लाल पत्थरों से उतरता रंग, चारदीवारी को तोडकऱ बदरंग करने, पास ही खड़े गिराऊ दरख्त, थोड़ा आगे चले तो साइकिल स्टैंड के गेट पर टंगी टूटी सीमेंट की चद्दरें और पड़ा पत्थरों का मलबा, पास ही खड़ी झाडिय़ां, दूसरी ओर रेल डाक सेवा के समीप बदरंग भवन इसकी चमक को फीकी करते दिखाई पड़ते हैं। यहां से गुजरने वाले शख्स का ध्यान यह ऐतिहासिक विरासत अब भी अपनी ओर आकर्षित करती है, लेकिन वह भी इसकी दुदर्शा को देख मन मसोसने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाता।