
अलवर जिला मुख्यालय से करीब 42 किलोमीटर दूर व उप खण्ड क्षेत्र से करीब 25 कि.मी. दूर तालवृक्ष धाम स्थित है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक दोनों ही रूप से इस स्थान का विशेष महत्व है । जानकारी के अनुसार तालवृक्ष माडंव ऋषि की तपोस्थली रहा है । इस स्थान पर ताल अर्जुन व खजूर के वृक्ष बहुतायत में होने के कारण तालवृक्ष कहा जाता है । इस धाम के समीप स्थित है गांव मुण्डावरा जिसका नाम माडंव ऋषि के नाम पर ही पड़ा । यह स्थान महाभारत से भी जुड़ा है। किवंदती है कि महाभारत काल में पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियारों को तालवृक्ष में ताल के विशाल और ऊंचे वृक्षों में छुपा दिया था और यहां से विराटनगर जाकर विराट नरेश की सेवा की।
पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र है तालवृक्ष
तालवृक्ष को भी अब देखभाल की जरुरत है । यहां लगातार अनदेखी के चलते इसकी सुरम्यता पर ग्रहण लगता जा रहा था, लेकिन तालवृक्ष वन चौकी के वनपाल व क्षेत्रीय वन अधिकारी ने बनी सघन वन पर अंधाधुन्ध कटाई को रोकने में अपनी अहम भूमिका निभाई। जिसके कारण अब इस बनी जगंल में साभंर व हिरण स्वछंद विचरण करते नजर आते हैं तथा इस क्षेत्र में बाघ का आवागमन भी रहता है। वन विभाग के आला अधिकारी यदि इस क्षेत्र की ओर ध्यान दें और इस क्षेत्र को सफ ारी पार्क का दर्जा देकर पर्यटकों को घूमने के लिए रास्ता बना दिए जाए तो वन विभाग की राजस्व आय में इजाफ होगा। पाण्डूपोल की तरह ही इस क्षेत्र के कई तीर्थ स्थान हैं। जैसे गरवाजी, शीतल नाथ , गुणी वाले हनुमानजी, शिवलिंग व गर्म कुण्ड आदि।
गर्म व ठण्डे पानी के कुण्ड
तालवृक्ष के मुख्य आकर्षण गर्म व ठण्डे पानी के कुण्ड हैं। पहले ये कुण्ड कच्चे थे। नारायणपुर के तत्कालीन महाराजा रामसिंह ने इनका जीर्णोद्धार करवाया था। यहां गर्म पानी के कुण्ड में स्नान करने से चर्म रोग दूर होते हैं। तालवृक्ष में राजपूत कालीन छतरियां भी हैं। जिन पर मुगल शैली के चित्र बने हुए हैं जो आज भी देखे जा सकते हैं।
सात फ ीट ऊंचा है शिवलिंग
यहां पर अर्जुन के अराध्य देव की सात फ ीट ऊंची शिवलिंग है। जिसे भूतेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। यह पिण्डी जिस मंदिर में स्थापित है उसके गुम्बद में अनेक देवताओ की मूर्तिया तराशी हुई हैं।
गंगा माता का मंदिर
तालवृक्ष में गंगा मंदिर भी है जो की अपने आप में एक अनूठा मंदिर है । गंगा माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा यहां आमेर नरेश रामसिंह के शासन काल में बाबा पूरण दास ने कराई थी। जो आज भी विराजमान है, लेकिन देवस्थान विभाग की अनदेखी के कारण मंदिर की सारसंभाल नहीं हो पा रही है । यह मंदिर मध्यम श्रेणी का है।
खेत में निकले वराह भगवान
यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार की मूर्ति भी थी, जो कि अष्टधातु से बनी हुई थी। वह मूर्ति किसी किसान के खेत में हल की नोक में अटक कर संवत 2020 में खेत से बाहर आई, जिसे मंदिर बनाकर प्रतिष्ठित किया गया। लेकिन चोर उस मूर्ति को चुरा ले गए। बाद में उस मूर्ति को विदेश बेचने ले जाते समय कोलकाता के दमदम हवाई अड्डे से बरामद किया गया। अब यह प्राचीन मूर्ति अलवर के पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में विराजित है और प्रतिदिन इस मूर्ति की पूजा होती है।
Published on:
11 Apr 2018 04:20 pm
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