
अलवर. उपद्रवियों के आंसू गैस का तोड़ निकाल लेने पर अब पुलिस को भी पैरा मिलिट्री फोर्स की भांति पैलेट गन की जरूरत महसूस होने लगी है। विडम्बना ये है कि राजस्थान सहित ज्यादातर प्रदेशों में पुलिस के पास पैलेट गन नही हैं। ऐसे में दंगा आदि को काबू में करने के लिए पुलिस को गोलियां चलानी पड़ती हैं, जिसमें जनहानि की आशंका रहती है। बाद में जांच सहित कई कानूनी पेचीदगियों केचलते पुलिस भी गोलियां चलाने से बचती है। इससे दंगाइयों का काम आसान हो जाता है। जबकि पैलेट गन में प्लास्टिक व रबर के छर्रे निकलते हैं। इनसे शरीर पर चोट तो लगती है, लेकिन जनहानि नहीं होती। पुलिस अधिकारियों की भी मानें तो आन्दोलन, बलवा आदि में शामिल ज्यादातर लोग भडक़ाए हुए होते हैं। इन्हें नियंत्रण में करने के लिए गैर जानलेवा हथियारों को उपयोग होना चाहिए, लेकिन विडम्बना ये है कि पुलिस के पास इनसे निपटने के अत्याधुनिक हथियार नहीं हैं।
मिर्ची बम भी बेअसर
आंसू गैस के बाद दंगाइयों को काबू में करने के लिए मिर्ची बम भी आया। इसे लोगों पर फेंकने से आंखों व त्वचा में जलन होने लगती है। जानकारों की मानें तो मिर्ची बम भी ज्यादा असरदार नहीं है। दरअसल, इसका प्रभाव चंद लोगों तक रहता है। ऐसे में सैकड़ों लोगों की भीड़ को मिर्ची बम से काबू करना संभव नहीं होता।
आंसू गैस का निकाला तोड़
पुलिस की मानें तो दंगाइयों ने आंसू गैस का तोड़ निकाल लिया है। दंगे के दौरान वे इससे निपटने की पहले से तैयारी रखते हैं। आंसू गैस का गोला फायर होने पर ये उस पर गीले बोरे डाल देते हैं। इससे आंसू गैस का असर नहीं के बराबर रह जाता है। अलवर में दो अप्रेल की घटना में भी पुलिस ने खैरथल में आंसू गैस के गोले छोड़े। इसके बावजूद प्रदर्शनकारियों ने खैरथल थाने में आग लगा दी। पुलिस की कई गाडि़यां आग के हवाले कर दी।
हवाई फायर का भी मिटा भय
गोलियां चलाने की लम्बी प्रक्रिया के चलते दंगाइयों में हवाई फायर का भय भी मिट गया है। स्थिति ये है कि अब दंगाई हवाई फायर से भी नहीं डरते। अलवर में दो अप्रेल को ऐसा ही हुआ। इधर पुलिस हवाई फायर करती रही और उधर प्रदर्शनकारी थानों पर पथराव करते रहे। ऐसे में पुलिस बेड़े में पैलेट गन की आवश्यकता और बढ़ गई।
Published on:
10 Apr 2018 11:25 am
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