
अंग्रेजों पर कहर ढाने वाले राव तुलाराम का जीवन संघर्ष
अलवर. 'मारो फिरंगी को' का नारा लगाते हुए 1857 की क्रांति में जिन योद्धाओं ने भाग लिया था, उनमें अहीरवाल क्षेत्र के राव तुलाराम की स्थिति अग्रिम पंक्ति के क्रंतिवीर की थी। हरियाणा में वे क्रांति के शंखनाद थे। राजस्थान एवं हरियाणा के अनेक क्रांतिकारी उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे। देशी राजाओं का सहयोग यदि उस समय अंग्रेजों को नहीं मिला होता तो भारत सन 1857 में ही आजाद हो गया होता। हिंदुस्तान में क्रांति के कुचल दिए जाने के बाद राव तुलाराम विदेश चले गए तथा वहां की सरकारों को भारत की आजादी के लिए तैयार करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहे। इसी प्रयास में उनकी शहादत हो गई।
राव तुलाराम की क्रांतिकारी गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए राठ के इतिहासकार डॉ. प्रेमपाल यादव लिखते हैं कि सन 1825 में रेवाड़ी के राव परिवार में जन्म लेने वाले तुलाराम को ब्रिटिश विरोध की भावना विरासत में मिली थी। रेवाड़ी के राव परिवार ने 1803 में अंग्रेजों के विरुद्ध मराठों का साथ दिया था। जिसके कारण अंग्रेजों ने राव परिवार से यह जागीर छीन ली थी। इससे राव परिवार के सम्मान को गहरा धक्का लगा। तभी से राव परिवार अंग्रेजों से क्षुब्ध था। सन् 1839 में अपने पिता पूरनसिंह के निधन के बाद तुलाराम जागीरदार बना। उसके हृदय में अंग्रेजों के प्रतिरोध तो था। 10 मई 1857 को जब मेरठ में क्रांति का आगाज हुआ तो उसने क्रांति का खुलकर स्वागत किया और उसमें सक्रिय रूप से भाग लिया। राव तुलाराम ने सबसे पहले रेवाड़ी पर अधिकार किया। क्रांतिकारियों ने उसके नेतृत्व को स्वीकार करते हुए उसे रेवाड़ी का राजा घोषित कर दिया। राजा बनते ही राव तुलाराम ने बहादुरशाह जफर के पास दूत भेजकर क्रांति को मान्यता प्रदान करने का निवेदन किया। क्रांतिकाल में राव तुलाराम के अधिकार में लगभग 361 गांव आ गए थे। इन गांवों के राजस्व के बल पर उसने 5 हजार सैनिकों की एक विशाल सेना तैयार की। अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए उसने तोप ढालने का कारखाना भी स्थापित किया। 'बॉम्बे ओवरलैंड टाइम' के नवंबर 1857 के अंक में राव तुलाराम द्वारा बनवाई गई तोपों की बेहद सराहना की गई है। राव तुलाराम के उक्त कार्यों से बहादुरशाह जफर प्रभावित होकर उसे रेवाड़ी, मोरा और शाहजहांपुर का राजा बनने की मान्यता प्रदान कर दी। राव तुलाराम ने भी बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई में रुपय-पैसा, खाद्य सामग्री तथा सैनिक आवश्यकता की अन्य वस्तुएं भेजकर बहुमूल्य सहायता की। दुर्भाग्य से क्रांतिकारी दिल्ली को बचा नहीं पाये और सितंबर 1857 में दिल्ली पर पुन: अंग्रेजों का अधिकार हो गया। दिल्ली विजय के बाद अंग्रेजों के लिए राव तुलाराम की शक्ति को समाप्त करना बेहद आवश्यक हो गया था। इस कार्य हेतु पहले शावर्स को भेजा गया किंतु वह राव तुलाराम को पकडऩे में असफल रहा। शावर्स इस अभियान में रेवाड़ी के कृष्ण सिंह, झज्जर के अबूसमद खां तथा मुहम्मद अजीम बट्टू को भी बंदी बनाने में असफल रहा। सावर्स के इस अभियान ने एक प्रकार से क्रांतिकारियों की मदद ही की। ये क्रांतिकारी अपने-अपने स्थान छोड?र राजस्थान चले आए। राव तुलाराम भी उनके साथ था। सौभाग्य से इसी समय उन्हें जोधपुर लिजियम के क्रांतिकारी सैनिकों का भी सहयोग मिल गया था। इन सभी क्रांतिकारियों ने पहले रेवाड़ी को जीता और फिर नारनौल में मोर्चाबंदी स्थापित कर ली।
नसीबपुर के युद्ध में अंग्रेज सेनापति जेरार्ड को मार गिराया
शावर्स के लौटने के बाद अंग्रेजों ने जेरार्ड को राव तुलाराम के विरुद्ध भेजा। जेरार्ड राव तुलाराम का पीछा करता हुआ 16 नवंबर, 1857 की सुबह नारनौल के निकट नसीबपुर गांव पहुंच गया। नसीबपुर में राव तुलाराम के नेतृत्व वाली भारतीय सेना और अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में क्रांतिकारी दस्ते ने जेरार्ड को मार गिराया। जेरार्ड के मरने के बाद कोलफील्ड ने मोर्चा संभाला।दोनों ओर से भयंकर युद्ध हुआ। चूंकि अंग्रेजों के पास हथियारों की कोई कमी नहीं थी और उन्हें गोरखा,पटियाला,नाभा सरीखी रियासतों का सैनिक सहयोग भी मिल गया था, इसलिए युद्ध में अंग्रेजों का पलड़ा भारी पड़ता गया।इस स्थिति में क्रांतिकारियों के सामने आत्मसमर्पण या मरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा। क्रांतिकारियों ने अंत समय तक युद्ध किया। ब्रिटिश इतिहासकार मालेसन लिखते हैं कि 'युद्ध में अंग्रेजों की विजय निश्चित दिखाई देने के बावजूद भी विद्रोही सैनिक पूरे साहस के साथ लड़े तथा उन्होंने एक दृढ़ संकल्प के साथ अपने प्राण न्योछावर कर दिए। नसीबपुर के युद्ध में प्राणों की आहुतियां देने वाले क्रांतिकारियों की संख्या 5000 के पार पहुंच गई थी। राठ के लोग इस विकट परिस्थिति में क्रांतिकारियों को यदि शरण प्रदान नहीं करते तो इस संख्या और भी अधिक बढ़ सकती थी। नसीबपुर के युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देने वाले राव रामसिंह को गंडाला गांव के लोगों ने अनेक दिनों तक छुपाये रखा था।
राठ के गंडाला में की थी विदेशी अभियान की तैयारी
विदेशी अभियान का मुखिया नियुक्त होने के बाद राव तुलाराम ने अपने अनुयायियों को 1859 की सर्दियों में राठ के गंडाला गांव में एकत्रित होने का संदेश भेजा। अनुयायियों के साथ-साथ वह स्वयं भी यहां चला आया। यहां उसने अपनी तैयारी को अंतिम रूप दिया। तदुपरांत मारवाड़ी वेश धारण करके अहमदाबाद होते हुए अपने दल के साथ मुंबई पहुंचा। वहां से 1859 के अंतिम दिनों में ब्रिटिश खुफिया विभाग की आंखों में धूल झोंककर बसरा जाने वाले जहाज में बैठकर देश छोड़ दिया।
राव तुलाराम को राठ से मिला था अंत समय तक सहयोग
1857 की लड़ाई में राव तुलाराम को राठ से सहयोग सक्रिय रूप में मिला था। कर्ण त्रिपाठी (बहरोड़), प्राणसुख यादव (निहालपुरा), ठाकुर दलेल सिंह(कांटी) इत्यादि हरियाणा के मैदानों में उसकी तरफ से लडऩे वाले राठ के प्रमुख योद्धा थे। प्राणसुख यादव की वीरता के किस्से सिख इतिहास में भरे पड़े हैं। राव तुलाराम से जुडऩे से पूर्व वह पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह का सेनापति रह चुका था। आंग्ल-सिख युद्धों में उसने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। सिख साम्राज्य के समाप्त होने के बाद वह नारनौल-महेंद्रगढ़ क्षेत्र में आ गया और इस क्षेत्र की जनता को अंग्रेजों के विरुद्ध प्रशिक्षित किया। नसीबपुर युद्ध के बाद प्राणसुख यादव निहालपुरा बस गया। कर्ण त्रिपाठी ने बहरोड़ को केंद्र बनाकर अनेक दिनों तक अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। कर्ण त्रिपाठी का भाई राम पंडित(सालिगराम त्रिपाठी) भी राव तुलाराम का प्रमुख सहयोगी था। राव तुलाराम जब विदेशी अभियान पर निकाला था, उस समय राम पंडित को भी अपने साथ लेकर गया था। राम पंडित के काबुल से लौटने की कोई जानकारी नहीं मिलती है। अनुमान लगाया जाता है कि राम पंडित भी राव तुलाराम की तरह इस अभियान में शहीद हो गया होगा।
Published on:
23 Sept 2024 05:29 pm
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