
अलवर. तूफान से चरमराई विद्युत व्यवस्था को सुधारने में निगम का पूरा अमला जुटा हुआ है। इस अमले में दो कर्मचारी एेसे भी हैं, जो घर बार को छोड़ आमजन के घरों में उजियारे को लेकर दिनरात जुटे रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि चरमराया विद्युत तंत्र बहुत कुछ पटरी पर आ गया और लोगों को राहत मिली। यदि एेसा जज्बा सभी दिखाते तो अलवर की विद्युत व्यवस्था एक दिन में ही सुधर जाती।
घर की जगह सीधे फील्ड में पहुंची नीलिमा
तूफान में बिजली तंत्र के चरमरा जाने से जहां चहुंओर बिजली-बिजली का शोर मचा है। वहीं, एक महिला ऐसी भी है, जो तीन दिन से अपने घर की जगह दूसरों के घरों में उजियारा फैलाने में जुटी हुई है। हम बात कर रहे हैं विद्युत निगम की जेईएन नीलिमा की। एचटीएम में जेईएन नीलिमा चाहती तो वह सबसे पहले अपने घर की बिजली दुरुस्त करती, इसकी जगह वह सीधे फील्ड में चली गई और तीन दिन तक घर का चेहरा भी नहीं देखा। नीलिमा बताती हैं कि मौसम जब बिगड़ा, तब वह ऑफिस में थी। तूफान की तबाही के बाद वह घर नहीं गई। उसने कर्मचारियों को कॉल किया और टीमें बना शहर में निकल गई। सबसे पहले उसने लाइनों की पेट्रोलिंग की और रात में ही हॉस्पिटल व जेल की बिजली चालू कर दी। अगले दिन उसकी टीम ने दिन-रात काम किया।
इसका नतीजा ये हुआ कि शहर में बिजली की स्थिति नियंत्रण में आ गई। सबसे ज्यादा समय उन्हें 220 जीएसएस से स्टेडियम की लाइन में लगा। वे बताती हैं कि इस लाइन की स्थिति बेहद खराब थी, जिसे सुधारने में उनकी टीम तीसरे दिन भी जुटी रही। दिनरात की मेहनत के बाद नीलिमा के लिए सबसे खुशी की बात ये थी कि शहर में चरमराई बिजली व्यवस्था बहुत कुछ पटरी पर आ गई।
तूफान के बाद आंखों से गायब हो गई नींद
तूफान से चरमराई विद्युत व्यवस्था को सुधारने में जुटे निगम के अमले में एक कर्मचारी ऐसा भी है, जिसकी तबाही के बाद आंखों से नींद गायब हो गई है। यह कर्मचारी तीन दिन में केवल डेढ़ घंटे सोया और दिन रात इधर से उधर क्रेन लेकर लाइनों से पेड़ व टहनियां हटाने में जुटा रहा। हम बात कर रहे हैं एचटीएम के जेईएन केके शर्मा की। शर्मा बताते हैं कि तूफान में हजारों पेड़ टूटकर लाइनों पर गिर गए। इन्हें हटाने बिना लाइनों को दुरुस्त किया जाना संभव नहीं था। इसलिए उसने यह मोर्चा संभाला और अपनी टीम व क्रेन लेकर तूफान के बाद से सडक़ों पर निकल पड़ा।
पहले दिन रातभर काम करने के लिए बाद भी लाइनों से चंद पेड़ हट सके। दरअसल वे लाइनों मेें बुरी तरह उलझे हुए थे। इससे एकबारगी वह हताश हो गया। उसे लगा कि कैसे काम होगा? इसके बाद उसकी आंखों से नींद गायब हो गई। वह टीम को लेकर दिनरात इस काम में जुट गया और तीन दिन में स्थिति को काबू में ले आया। शर्मा बताते हैं कि वे तीन दिन में केवल डेढ़ घंटे सोए। इस दौरान भी उनकी आंखों से नींद कोसों दूर थी। लगातार काम से इस दौरान बस थोड़ी थकान दूर हुई। इसके बाद वह फिर काम में जुट गया।
Published on:
05 May 2018 03:22 pm
बड़ी खबरें
View Allअलवर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
