
Vivekanand Jayanti : स्वामी विवेकानंद का राजस्थान के इस शहर से था गहरा नाता, नौजवान की टोलियों के साथ गाते थे भजन
अलवर. स्वामी विवेकानन्द का अलवर से गहरा नाता रहा। स्वामी विवेकानन्द फरवरी 1891 में पहली बार अलवर आए थे, लेकिन उनकी स्मृतियां यहां आज भी जिंदा हैं। अलवर आने के बाद उन्हें उस समय के प्रसिद्ध डॉक्टर गुरुचरण ने अपने यहां ठहराया, वह स्थान सीएमएचओ कार्यालय के पास स्थित है। उस दौरान स्वामी विवेकानन्द ने जहां ध्यान लगाया और वे जहां ठहरे, वहां अब यूआईटी की ओर से 42 लाख की लागत से स्वामी विवेकानन्द स्मारक बनाया गया है। यह स्मारक बनकर तैयार हो चुका है। इस स्मारक में स्वामी विवेकानन्द की ध्यान मुद्रा में मूर्ति लगाई गई है। यह मूर्ति कांस्य से निर्मित है। इस मूर्ति की लागत करीब 10 लाख रुपए आई है। इस स्मारक में एक हॉल बनाया गया है, हॉल में ही मूर्ति को रखा गया है।
अलवर से था खास लगाव
स्वामी विवेकानन्द को अलवर से बेहद खास लगाव था, वे तीन बार अलवर आए। स्वामी विवेकानन्द जब पहली बार अलवर स्टेशन पर उतरे और पैदल चलकर इसी स्थान पर ठहरे की इच्छा वार्ता की। यहां ठहरने के बाद वे प्रार्थना सभा करते व भक्ति सभा करते। यहां उनकी एक मित्र मंडली बन गई। स्वामी विवेकानन्द यहां बंगाली गीतों को मधुर आवाज में गाते और उनकी व्याख्या करते। वे कई नौजवानों के साथ टोली बनाकर भजन गाते व बजाते शहर का भ्रमण करते।
उनके लिखे पत्र और इतिहासकारों के अनुसार स्वामी विवेकानन्द ने 1891 व 1894 में चार पत्र अशोका टाकीज के यहां रहने वाले गोविन्द सहाय को लिखे थे। इन पत्रों में स्वामीजी ने लिखा कि (वत्स, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है। व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना और सच्चा बर्ताव करना इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल मात्र प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, बल्कि जो उस परम पिता की इच्छानुसार कार्य करता है। वही धार्मिक है। अलवर निवासी युवको तुम लोग जितने भी हो, सभी योग्य हो। मैं आशा करता हूं कि तुममें से अनेक व्यक्ति अविलम्ब ही समाज के भूषण तथा जन्म भूमि के कल्याण के कारण बन सकेंगे।
कई दिनों तक रुकते थे अलवर
स्वामीजी जब भी अलवर आए। हर दिन जनता के बीच रहकर उनकी बात सुनते। धर्म पर चर्चाएं करते और प्रवचन देने का क्रम रहता था। अलवर में अशोका टाकीज के निकट लाला गोविन्द सहाय के मकान के एक कमरे में स्वामीजी कई दिनों तक रुके थे। उसके बाद यह कमरा मंदिर का रूप ले चुका है। आज भी इस कमरे में स्वामीजी के अलावा उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस व उनकी माता की पूजा होती है। लाला गोविन्द सहाय के पौत्र राजाराम मोहन गुप्ता के पास स्वामीजी के लिखे पत्र भी सुरक्षित हैं। बंगाली डॉ. गुरुचरण लश्कर उस समय सरकारी अस्पताल के प्रमुख थे। मौजूदा सीएमएचओ कार्यालय उनका निवास स्थान रहा। वहां पर स्वामीजी भी कई दिनों तक रुके थे।
Published on:
12 Jan 2019 01:16 pm

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