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वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की सख्ती, बिल्डर को निर्माण से पहले बताना होगा कितना मलबा निकलेगा

दिल्ली और एनसीआर में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने एक अप्रेल से सख्ती कर दी है।

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अलवर

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Umesh Sharma

Mar 30, 2026

अलवर. दिल्ली और एनसीआर में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने एक अप्रेल से सख्ती कर दी है। खासकर मलबे से उड़ने वाली धूल को लेकर आयोग ने सख्ती दिखाई है। इसमें नगर निगम को भी पाबंद किया गया है।
आयोग के निर्देशानुसार हर पांच किमी पर नगर निगम को एक कचरा संग्रहण केंद्र बनाना होगा, जहां निर्माण और तोड़फोड़ से निकला मलबा जमा किया जाएगा। यही नहीं 200 वर्गमीटर से बड़े भूखंड पर निर्माण या पुनर्निर्माण से पहले बिल्डर को यह बताना होगा कि वहां से कितनी मात्रा में मलबा निकलेगा। यही नहीं निर्माण से पहले यह मलबा जमा करवाकर इसकी रसीद भी लेनी होगी। गौरतलब है कि सीएक्यूएम की ओर से हर साल प्रदूषण कम करने के लिए अनेक आदेश जारी किए जाते हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन का सहयोग नहीं मिलने की वजह से इनकी पालना नहीं हो पाती है। रोक के बावजूद निर्माण कार्य चलते रहते हैं। खुद सरकारी कामों को बंद नहीं किया जाता है। इस वजह से प्रदूषण कम नहीं हो पाता।
मलबे को ढककर ही ले जा सकेंगे
आयोग ने साफ कर दिया कि मलबे को ढककर ही ले जाया जा सकेगा। बिना मलबा जमा कराए काम आगे नहीं बढ़ सकेगा। इसकी रसीद के आधार पर ही काम करने की अनुमति मिलेगी। साथ ही, कम्प्लीशन सर्टिफिकेट जारी करने से पहले भी इस रसीद के आधार पर जांच की जाएगी।
मलबा कलेक्शन का कोई केंद्र नहीं
अभी अलवर में मलबा कलेक्शन को लेकर कोई व्यवस्था नहीं है। सामान्य कचरे के साथ ही मलबा फेंका जा रहा है। यही नहीं सुनसान रास्तों पर निर्माणकर्ता रात के वक्त मलबा पटक देते हैं। इसे लेकर कई बार विरोध भी हो चुका है, लेकिन नगर निगम इस ओर ध्यान नहीं देता है। शहर के आसपास नहर, नदी और नालों में भी मलबा फेंका जा रहा है। बारिश के दौरान यह इन्हें अवरुद्ध भी कर देता है।
इसलिए पड़ी जरूरत
दिल्ली और एनसीआर में तोड़फोड़ और मलबे से निकलने वाली धूल को प्रदूषण का एक बड़ा कारण बताया गया है। हर साल प्रदूषण बढ़्ने पर इन गतिविधियों पर रोक भी लगाई जाती है। इस धूल से हवा में पीएम 10 और 2.5 के कण बढ़ जाते हैं जो सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ा देते हैं। सर्दियों के मौसम में यह समस्या ज्यादा होती है।