
1 नवंबर 1803 में लसवाड़ी (नसवारी) का युद्ध लड़ा गया था, जो कि एक निर्णायक युद्ध था।
गोविन्दगढ. गोविंदगढ़ उपखंड से 11 किलोमीटर दूर स्थित आज का नसवारी गांव प्राचीन समय में लसवाडी के नाम से जाना जाता था। 1 नवंबर 1803 में लसवाड़ी (नसवारी) का युद्ध लड़ा गया था, जो कि एक निर्णायक युद्ध था। अंग्रेज सेना यहां हारते-हारते बची थी।
इतिहास के जानकार अनिल कुमार, राहुल, इकबाल बताते हैं कि इस युद्ध में अंग्रेजों का साथ अलवर के तत्कालीन राजा बख्तावर सिंह ने अलवर की फौज को अहमद बख्श खान के नेतृत्व में 3 दिन पहले ही अंग्रेजों के शिविर में भेज चुके थे। भरतपुर रियासत की सीमा के पास स्थित और अलवर रियासत की सीमा में लसवाडी गांव के आसपास फैले इस युद्ध क्षेत्र का अहमद बख्श ने अंग्रेजों के सेनानायक गेरालड लेक को पूरा नक्शा समझाया। रणनीति बनाई और अपनी सेना तथा अलवर की स्थानीय जनता को ब्रिटिश फौज के पक्ष में खड़ा किया। इधर हिंदुस्तानी फौज का साथ देने के लिए नीमराणा रियासत के नेतृत्व में लसवाड़ी इलाके के हजारों ऊंट सवार, घुड़सवार और पैदल सैनिक नसवारी पहुंचे। नीमराणा के राजा उस समय चंद्रभान सिंह चौहान थे। लसवाडी का युद्ध एक इतिहास प्रसिद्ध भयंकर युद्ध था। जिसमें लिखित दस्तावेजों के मुताबिक 7000 लोग मारे गए और 800 से अधिक लोग गंभीर घायल हुए थे।
नसवारी से गुजरती है रूपारेल नदी :
अलवर जिले की उदय भान उदय नाथ की पहाड़ियों से निकलने वाली रूपारेल नदी के तट के किनारे नसवारी गांव बसा हुआ है। आज भी यहां पर एक टीला है, जिसमें बताया जाता है कि अंग्रेज सैनिकों के शव यहीं पर दफनाए गए थे।
नदी में हो रहा है अवैध खनन
रूपारेल नदी में पानी नहीं होने के कारण भारी मात्रा में बजरी निकाल कर अवैध खनन किया जा रहा है। कभी पानी से हिचकोले खाने वाली नदी आज सूखी पड़ी है। नसवारी के ग्रामीण बताते हैं कि भारत के आजाद हो जाने के बाद भी इंग्लैंड से अंग्रेज आते थे। इतिहासकार बताते हैं कि नसवारी में एक मिट्टी का टीला है। यहां युद्ध में मारे गए अंग्रेज अफसरों के शव को दफनाया गया था। इस युद्ध में मेजर, कर्नल और कमांडर मेजर जनरल बेयर भी मरने वालों में शामिल थे। खुद सेनानायक गेराल्ड लेक का बेटा भी युद्ध में मारा गया, जिसके शव को मिट्टी के टीले में दफनाया हुआ है। आज भी सर झुकाने के लिए
इंग्लैंड से लोग यहां आते हैं।
लसवाडी में हिंदुस्तानी फौज का नेतृत्व किया था मराठा सेनानायक में
इतिहास के जानकार बताते हैं कि नसवाडी में हिंदुस्तान फौज का नेतृत्व मराठा सेनानायक अंबाजी इंगले ने किया था तथा दौलतराव सिंधिया प्रतिनिधि थे। अंत में जब यह मैदान निर्णायक रूप में अंग्रेजों के हाथ में चला गया तो राठ की एक घुड़सवार टुकड़ी ने रातों-रात घायल सेनानायक अंबाजी इंगले को युद्ध मैदान से निकालकर नीमराणा के किले में पहुंचाया। अंग्रेजों के बाद रिकॉर्ड में इसलिए नीमराणा के राजा चंद्रभान सिंह को बागी राजा लिखा है।
Published on:
11 Apr 2024 12:07 am
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