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कौन सुनेगा महिलाओं की पीड़ा, 12 साल में भी नहीं लगाया कोई अधिकारी

समय पर नहीं हो रही सुनवाई

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अलवर

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Prem Pathak

Jul 17, 2018

Waiting for appointment of officer in women's empowerment department

कौन सुनेगा महिलाओं की पीड़ा, 12 साल में भी नहीं लगाया कोई अधिकारी

अलवर. महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार ने घरेलू हिंसा रोकथाम अधिनियम तो पारित कर दिया लेकिन लागू होने के बारह सालों बाद भी इसमें सरंक्षण अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई है। इसके चलते घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की डीआईआर (डोमेस्टिक इंस्टेंट रिपोर्ट ) लिखने में देरी हो रही हैं। ऐसे में जो महिलाएं समय पर न्याय मिलने की उम्मीद में इस कानून का सहारा लेती है उनको समय पर कानूनी मदद नहीं मिल पा रही है।

सीडीपीओ पर आया अतिरिक्त भार

महिला अधिकारिता विभाग की ओर से घरेलू हिंसा से रोकथाम अधिनियम के तहत महिलाओं की सुनवाई की जाती है लेकिन संरक्षण अधिकारी नहीं होने के कारण मामलों को कानूनी रूप से लिखने, इनके पेश होने, इसकी सुनवाई होने में समय लग रहा है। फिलहाल यह काम विभाग के सीडीपीओ को सौंपा गया है। विभाग की करीब 27 योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी भी सीडीपीओ पर ही होती है। ऐसे में सभी सीडीपीओ विभागीय कार्यो को पहले करते हैं।

103 प्रकरण लंबित

वर्तमान में अलवर में करीब 103 प्रकरण लंबित हैं। शहर में वर्ष 2018 में 26, वर्ष 2017 में 93 प्रकरण दर्ज किए गए। अधिनियम के प्रचार प्रसार के लिए एनजीओ, सेवा प्रदाताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। इससे महिलाओं में जागृति आ रही है और विभाग में मामले बढ़ रहे हैं। लेकिन सुनवाई में देरी हो रही है।

कानूनी ज्ञान का रहता है अभाव

घरेलू हिंसा रोकथाम अधिनियम के तहत विभाग की ओर से नियुक्त कार्यवाहक सीडीपीओ को पीडित महिलाओं के सहायता मंागने पर मामले की डीआईआर भरनी होती है। शहरी क्षेत्र में तो यह सुविधा भी नहीं है। इसके बाद अदालत में यह डीआईआर पेश की जाती है जहां पर दोनों पक्षों की सुनवाई होती है। प्रोटेक्शन ऑफिसर कानून का जानकार होता है। मामले को लिखने व अदालत में पेश करने व जवाब देने में सक्षम होता है। लेकिन कार्यवाहक अधिकारी केवल कर्मचारी होते हैं वो केवल एक फार्म भरकर उसी के आधार पर अदालत में मामला लेकर जाते हैं।

शीघ्र होगी भर्ती, प्रक्रिया शुरु

संरक्षण अधिकारी के नहीं होने से काफी परेशानियंा आ रही हैं क्योंकि यह कानून से जुडा मसला है। अधिकारी इसे कानूनी तरीक से नहीं लिख पाते हैं। कानून के जानकार अच्छी तरह से काम कर सकेंगे। भर्ती की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है।
रिषिराज सिंहल, सहायक निदेशक, महिला अधिकारिता विभाग

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