
कांग्रेस में शामिल होते ही विवादों में घिरे कासनी
चंडीगढ़। हरियाणा की लगभगत सभी सरकारों में चर्चित रहे पूर्व आईएएस प्रदीप कासनी के कांग्रेस में शामिल होने के बाद जहां चर्चाओं का नया दौर शुरू हो गया है वहीं प्रदीप कासनी अपनी नई पारी को लेकर विवादों में घिर गए हैं। क्योंकि उन्होंने हरियाणा के ऐसे राजनीतिक दल का दामन थामा है जिसके शीर्ष नेता पिछले कई वर्षों से आपसी गुटबाजी में उलझे हुए हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि प्रदीप कासनी खुद को कैसे बैलेंस कर पाएंगे।
कासनी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. अशोक तंवर के माध्यम से कांग्रेस में शामिल हुए हैं। प्रदेश इकाई में तंवर का अपना खेमा है और इस नाते कासनी को साथ जोडक़र तंवर ने दूर तक संदेश देने की कोशिश की है बल्कि अपने सियासी ड्राइंगरूम में एक ऐसा चेहरा भी शामिल कर लिया है जो अपनी अलग कार्यशैली के कारण ब्यूरोक्रेसी से लेकर सियासी गलियारों में चर्चाओं में घिरा रहा।
अपने करीब 33 वर्ष के कार्यकाल में कासनी की छवि सरकार तथा सिस्टम विरोधी अधिकारी की रही है। कासनी ने भी रिटायरमेंट के करीब आते-आते अपना पूरा ध्यान अपने पसंदीदा कर्म साहित्य और किताबें लिखने का दिया था लेकिन, एकाएक वे नई भूमिका में आकर सबका ध्यान अपनी ओर खींच चुके हैं।
कासनी की पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के आखिरी दिनों में भी सिस्टम के साथ बिगाड़ हो गया था। उन्होंने प्रशासनिक सुधार विभाग में रहते हुए कुछ आयोगों में नियुक्तियों पर सवाल खड़े कर हुड्डा सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी कर दी थीं। इन नियुक्तियों को विपक्ष ने हुड्डा द्वारा अपने चहेतों को एडजस्ट करने का आरोप लगाया था। हुड्डा सरकार से इसी टकराव पर उस समय की विपक्षी बीजेपी ने लपका और कासनी और दूसरे चर्चित अधिकारी अशोक खेमका के पीछे खड़े दिखाई दिए।
प्रदेश में सत्ता बदली तो कासनी एकाएक बीजेपी के ब्लू आई ब्वॉय के रूप में नजर आने लगे। उनका नाम शुरुआत में सीएमओ तक के लिए चला लेकिन, बाद में उन्हें गुरुग्राम के कमिश्रनर जैसे अहम पद पर भेजा लेकिन, एक विवाद ने कासनी और बीजेपी सरकार के रिश्तों को इतना बिगाड़ दिया कि कासनी रिटायरमेंट तक अपने लिए विभाग के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते रहे।
कासनी एकाएक नई भूमिका में आकर कांग्रेसमय हो चुके हैं। उनके ऊपर तंवर और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का हाथ आ चुका है। अब सियासी गलियारों में सवाल बना हुआ है कि कासनी को आगे चलकर उन भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ टेबल या मंच साझा करना पड़ेगा, जिनके साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा है। ऐसे में यह साफ है कि हुड्डा खेमा कासनी को स्वीकार नहीं करेगा और कासनी के लिए राजनीति की राह में कई मुश्किलें रहेंगी।
Published on:
15 Jun 2018 10:22 pm
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