
आजादी के बाद इस बड़ी गलती की वजह से दुनियाभर के निशाने पर आया अमरीका
नई दिल्ली। आजादी के बाद अमरीका ने यूं तो विकास की नई इबारतें लिख डालीं। देश और दुनिया के लिए अमरीका ने कई बड़े काम कर अपना नाम किया, लेकिन एक बड़ी चूक ने अमरीका को दुनिया के निशाने पर खड़ा कर दिया। ये बड़ी गलती थी। पेरिस संधि से खुद को अलग करना अमरीका खास तौर पर राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल संभालने वाले डोनाल्ड ट्रंप की बड़ी असफलता थी जिसकी दुनिया ने निंदा की।
अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अंतरराष्ट्रीय निंदा के बावजूद अमरीका पेरिस समझौते से पीछे हट रहा है। उन्होंने व्हाइट हाउस में कहा, "अमरीका और उसके लोगों की रक्षा करने की मेरी जिम्मेदारी को पूरा करते हुए, अमरीका पेरिस समझौते से अलग होगा। " उन्होंने कहा, "फिलहाल अमेरिका गैर बाध्यकारी पेरिस समझौते और इस समझौते की वजह से हम पर लादे गए क्रूर वित्तीय और आर्थिक बोझ को लागू करने के सारे कदमों पर रोक लगा रहा है।"
इसलिए ट्रंप संधि से अलग हुए
ट्रंप ने ग्रीन क्लाइमेट फंड को खत्म करने का भी एलान किया जिससे उनके मुताबिक अमरीका पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह फिर से ऐसे जलवायु समझौते पर बात करने को तैयार हैं जो अमरीका के लिए ज्यादा फायदेमंद हो।
आपको बता दें कि दुनिया के लगभग 200 देशों ने 2015 में पेरिस में जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले अमरीका और चीन भी इसमें शामिल थे। यह समझौता दुनिया भर के तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस पर रोकने की बात करता है।
ऐसे हुई दुनियाभर में अमरीका की निंदा
फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने ट्रंप के "मेक अमरीका ग्रेट अगेन" नारे का उपहास करते हुए ट्वीट किया, "मेक अवर प्लानेट ग्रेट अगेन". इसके साथ ही उन्होंने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए अंग्रेजी में अपील पोस्ट की कि वे अमरीका से बाहर फ्रांस में आकर अपना काम करें।
विश्व समुदाय के लिए 'काला दिन'
यूरोपीय संघ के सर्वोच्च जलवायु परिवर्तन अधिकारियों ने पेरिस समझौते से अमरीका के हटने को विश्व समुदाय के लिए "काला दिन" बताया है। जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की तरफ से उनके प्रवक्ता स्टेफेन जाइबर्ट ने ट्रंप के फैसले पर निराशा जताई है।
पेरिस जलवायु संधि की खास बातें
- पेरिस का घोषित लक्ष्य ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना है।
- समझौता 2020 से लागू होगा और यह अमीर और गरीब देशों के बीच इस बारे में दशकों से जारी गतिरोध को समाप्त करता है कि ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए प्रयासों को आगे कैसे बढ़ाया जाए। जिस पर अरबों डॉलर खर्च होना है और अभी से सामने आने वाले दुष्परिणामों से कैसे निपटना है।
- वित्तपोषण मुद्दे पर विकसित देश 2020 से विकासशील देशों की मदद करने के लिए हर साल कम से कम 100 अरब डॉलर जुटाने पर सहमत हुए पर बाध्य नहीं हैं।
Published on:
04 Jul 2018 02:43 pm

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