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सांस थमने का इंतजार न करें:  आइएलडी  को जानें

इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (ILD) के शुरुआती लक्षण, निदान में देरी के कारण और समय पर इलाज की अहमियत जानें। लगातार सांस फूलने और सूखी खांसी को नजरअंदाज न करें।
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Updated: 4 Nov 2026, 10:47 AM IST
Dr. Virendra Singh
Dr. Virendra Singh

आइएलडी के शुरुआती लक्षण 

 ज्यादा चलने या सीढ़ी चढ़ने के बाद सांस फूलना और ऐसी सांस की समस्या, जो लगातार बढ़ती जाए, एक साधारण बात बात नहीं है। ऐसे चेतावनी के संकेत रोजमर्रा के जीवन में  दिखाई दे सकते हैं—जैसे सामान्य रूप से की जाने वाली सैर के दौरान पहले से अधिक बार रुकना, उन सीढ़ियों को चढ़ने में परेशानी होना जिन्हें पहले आसानी से चढ़ लेते थे, लगातार बनी रहने वाली सूखी खांसी, या सांस लेने में कठिनाई के कारण धीरे-धीरे रोजमर्रा की गतिविधियां कम कर देना। इन लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन यदि ये बने रहें या बढ़ते जाएं, तो ये इंटरस्टिशियल लंग डिजीज (ILD) का शुरुआती संकेत हो सकते हैं और इनके बारे में डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए। समय पर चिकित्सकीय जांच से कारण की पहचान जल्दी करने में मदद मिल सकती है।

बीमारी के बढ़ने को समझना

ILD ऐसी कई बीमारियों  का एक व्यापक समूह है, जो फेफड़ों की सांस नालियों के अंतिम छोर की हवा की थैलियों (air sacs) के आसपास स्कारिंग यानि सिकुड़न पैदा करती है। इससे अंगूर जैसे साधारण फेफड़े किशमिश जैसे बन जाते है। इससे रोगी को सांस और खांसी की तकलीफ होने लगती है। हर ILD बीमारी बढ़ने वाली नहीं होती और हर व्यक्ति में इसका बढ़ना एक जैसा नहीं होता।

ILD के 200  प्रकारों में Idiopathic Pulmonary Fibrosis (IPF) बढ्ने वाली  बीमारी है।  IPF के अलावा कुछ अन्य fibrotic ILD में भी फेफड़ों में होने वाला स्कारिंग समय के साथ बढ़ सकता है। बीमारी के बढ़ने की गति और उसका तरीका अलग-अलग व्यक्तियों में काफी अलग हो सकता है।

डॉक्टर समय के साथ इस स्थिति का आकलन करते हैं। इसके लिए वे लक्षणों, फेफड़ों की कार्यक्षमता और इमेजिंग में दिखाई देने वाले बदलावों का कई प्रकार की जांच कर ILD बीमारी के कारण और गंभीरता का आंकलन करते है।

ILD क कारण और गंभीरता  की पहचान हो जाने के बाद भी डाक्टर के पास नियमित फॉलो-अप महत्वपूर्ण रहता है। नियमित जांच से डॉक्टर यह समझ सकते हैं कि सांस फूलने, गतिविधि के स्तर, फेफड़ों की कार्यक्षमता या इमेजिंग में कोई महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है या नहीं यानि बीमारी तेज गति से बढ़ रही है या स्थिर है।

भारत में हुए एक अनुसंधान  से मिले आंकड़े बताते हैं कि लगातार निगरानी  महत्वपूर्ण है।

निदान में समय क्यों लग सकता है?

कई मामलों में ILD का निदान करने में अतिरिक्त समय लग सकता है, क्योंकि इसके लक्षण दूसरी श्वसन संबंधी बीमारियों से मिलते-जुलते होते हैं। उदाहरण के लिए, सांस फूलने और खांसी को शुरुआत में अधिक सामान्य बीमारियों से जोड़ा जा सकता है।

देश के 19 शहरों के 27 केंद्रों पर किए गए ILD India Registry के परिणाम American Journal of Respiratory and Critical Care Medicine में प्रकाशित हुए हैं।  इस अध्ययन से हमारे देश के ILD के रोगियों की सही निदान में महत्वपूर्ण देरी की जानकारी सामने आई।

देश की इस ILD Registry में पता लगा की लगभग 95% ILD के रोगियों में  सात कारण ही जिम्मेदार थे। इनमे  IPF भी एक कारण था। अन्य कारणों  में hypersensitivity pneumonitis शामिल था, जो अक्सर वातावरण या कार्यस्थल पर सांस के साथ अंदर जाने वाले पदार्थों के संपर्क से जुड़ा होता है। इसके अलावा rheumatoid arthritis जैसी autoimmune बीमारियों से जुड़ी ILD भी देखी गई।

बीमारी के सही प्रकार के कारण की पहचान करने से डॉक्टरों को उचित उपचार और फॉलो-अप तय करने में मदद मिलती है।

भारत में ILD के  निदान 2–4 वर्ष तक देर से हो सकता है और लगभग 15–20% मरीजों को सही निदान होने से पहले anti-tuberculosis (TB) उपचार दिया जा चुका होता है।

व्यावहारिक रूप से इसका मतलब है कि यदि लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ते जाएं तो दोबारा चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी है।

प्राथमिक स्तर पर डॉक्टर लगातार बने रहने या बिगड़ने वाले लक्षणों का दोबारा आकलन करके और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ के पास भेजकर निदान में होने वाली देरी को कम करने में मदद कर सकते हैं।

फेफड़ों से संबंधित विशेषज्ञ जांच के लिए pulmonologist (फेफड़ोंकेविशेषज्ञ) की आवश्यकता होती  है। जटिल मामलों में विशेषज्ञ मरीज के मेडिकल इतिहास, इमेजिंग, autoimmune जांच और pathology को एक साथ देखकर डायग्नोसिस  करते हैं।

बदलावों को पहचानें और समय पर चिकित्सकीय सलाह लें

Indian Chest Society और National College of Chest Physician, जो भारत की प्रमुख चिकित्सा संस्थाएं हैं, के consensus statement में ILD के मामले में शुरुआती डाइग्नोसिस  के महत्व पर स्पष्ट जोर दिया गया है।

शुरुआती पहचान से बीमारी का सही निदान करने, इलाज की योजना बनाने और समय के साथ होने वाले महत्वपूर्ण बदलावों पर उचित इलाज  देने का अवसर मिलता है।

मरीजों को तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक रोजमर्रा की गतिविधियां बहुत अधिक प्रभावित न हो जाएं। साथ ही, स्वयं बीमारी का इलाज  करने से भी बचना चाहिए।

इस आलेख का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि समय पर चिकित्सकीय जांच , उचित विशेषज्ञ देखभाल और सही फॉलो - अप सुनिश्चित करना है।

अस्वीकरण

यह सामान्य जानकारी केवल शैक्षणिक उद्देश्य के लिए दी गई है। यह चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। इस विषय से संबंधित जानकारी, मार्गदर्शन या प्रश्नों के लिए कृपया पंजीकृत चिकित्सक से परामर्श करें।

Dr. Virendra Singh, Chief Consultant - Respiratory Medicine and President Rajasthan Hospital, Jaipur.

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4 Nov 2026, 10:47 AM IST
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