जो इन बर्तनों को सुंदर रूप देते हैं। कभी इनके बर्तनों की डिमांड इतनी थी, कि Dhanteras पर इन पर मां लक्ष्मी जमकर मेहरबानी होती थीं
आगरा। Dhanteras 2017 पर धनवर्षा हो रही है। इलेक्ट्रोनिक मार्केट से लेकर आॅटो मोबाइल कंपनियों में जमकर खरीददारी की जा रही है, तो वहीं बर्तनों की दुकानों पर भी पैर रखने की जगह नहीं है। ऐसे में कंगाल वो हैं, जो इन बर्तनों को सुंदर रूप देते हैं। ये लोग हैं ठठेरे समाज के। कभी इनके बर्तनों की डिमांड इतनी थी, कि धनतेरस पर इन पर Maa Lakshmi जमकर मेहरबानी होती थीं, लेकिन आज इनकी आर्थिक स्थिति बेहद बदत्तर हो चुकी है।
आज नहीं है काम
लोकतंत्र रक्षक सेनानी और समाज के वरिष्ठ 65 वर्षीय देवी प्रसाद रिछारिया ने बताया कि आज से 30 वर्ष पहले ठठेरे समाज के परिवार बेहद सम्पन्न हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ही इनका काम कम होता चला गया। गोकुलपुरा में एक दौर वो था, कि हर घर में पीतल के बर्तन बनाने का काम चलता था। यहां करीब 550 ठठेरे समाज के परिवार की आय का मुख्य साधन बर्तन बनाने के कारखाने थे, लेकिन अब यहां बमुश्किल एक या दो परिवार ही इस पुश्तैनी काम से जुड़े हुए हैं।
इसलिए बिगड़ी हालत
अवधेश कुमार ने बताया कि समय बदल रहा है। 30 वर्षों में बहुत कुछ बदला है, जिसमें सबसे बड़ा बदलाव आया टैक्नॉलोजी में। अब पीतल के बर्तन बनाने के लिए बड़े बड़े कारखाने हैं, जिसमें मशीनरी से बर्तन बनते हैं। मशीन वाले बर्तन का रेट कम होते हैं, जबकि जो ठठेरों के यहां बर्तन बनते हैं, उनका रेट तो अधिक है, लेकिन ये अधिक सुंदर और मजबूत होते हैं। रेट अधिक होने के कारण इन बर्तनों की डिमांड में कमी आई है।
Taj Mahal ने भी छीन लिया रोजगार
जगन्नाथ ने बताया कि उनका रोजगार ताजमहल ने भी छीन लिया है। प्रदूषण के चलते प्रशासनिक अधिकारियों ने उनका काम बंद करवा दिया। इस काम में भट्टी भी चलती थीं। फिर उत्पीडन भी हुआ, आरोप ये लगता था, कि पीतल गलाने का काम हो रहा है, जिससे आहत होकर काफी लोगों ने इस काम से हाथ पीछे खींच लिए।