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आगरा में ‘टेरर फंडिंग’ के नाम पर रिटायर्ड कर्मचारी से 17 लाख से ज्यादा की ठगी; कई बार वीडियो कॉल, 22 दिन बाद FIR

Crime News: उत्तर प्रदेश के आगरा में 'टेरर फंडिंग' के नाम पर रिटायर्ड कर्मचारी से 17 लाख से ज्यादा की ठगी की गई। मामले में 22 दिनों के बाद एफआईआर दर्ज की गई है।

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आगरा

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Harshul Mehra

May 11, 2026

retired employee duped of over rs 17 lakh in the name of terror funding in agra crime news

गरा में 'टेरर फंडिंग' के नाम पर रिटायर्ड कर्मचारी से ठगी। फोटो सोर्स-Ai

Agra Crime News:उत्तर प्रदेश के आगरा में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का एक और बड़ा मामला सामने आया है। इस बार साइबर अपराधियों ने दूरसंचार विभाग के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को 'टेरर फंडिंग' और देश विरोधी गतिविधियों में फंसाने का डर दिखाकर लाखों रुपये की ठगी कर ली। आरोपियों ने खुद को पुलिस और CBI अधिकारी बताकर पीड़ित को 3 दिन तक मानसिक दबाव में रखा और आखिरकार उससे 17.75 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए।

मामले का खुलासा होने के बाद पीड़ित ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद करीब 22 दिन बाद FIR दर्ज की गई है।

WhatsApp कॉल से शुरू हुआ पूरा खेल

जानकारी के मुताबिक सैनिक नगर, राजपुर चुंगी निवासी 65 वर्षीय कुंदन सिंह दूरसंचार विभाग से सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं। उन्होंने बताया कि 14 अप्रैल को उनके पास एक अज्ञात नंबर से WhatsApp कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल कर एक सिम कार्ड लिया गया है। आरोपी ने कहा कि इस सिम का इस्तेमाल देश विरोधी गतिविधियों में किया गया है।

इसके बाद ठगों ने एक और कहानी गढ़ते हुए कहा कि उनके आधार कार्ड से केनरा बैंक में एक खाता भी खुलवाया गया है, जिसमें करीब ढाई करोड़ रुपये की टेरर फंडिंग हुई है।

गिरफ्तारी का डर दिखाकर बनाया दबाव

पीड़ित के अनुसार इसके बाद अलग-अलग नंबरों से लगातार कॉल आने लगे। आरोपी खुद को पुलिस और CBI अधिकारी बताते रहे और उन्हें गिरफ्तारी का डर दिखाकर मानसिक रूप से परेशान करते रहे। साइबर अपराधियों ने पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर रखा जिससे वह किसी अन्य व्यक्ति से सलाह ना ले सके। आरोपियों ने उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि मामला बेहद गंभीर है और जांच एजेंसियां उन पर नजर रख रही हैं।

बैंक पहुंचने तक कॉल पर रखा

पीड़ित ने बताया कि 15 अप्रैल को आरोपियों ने उनसे पैसे ट्रांसफर कराने की योजना बनाई। हैरानी की बात यह रही कि जब तक वह बैंक नहीं पहुंच गए, तब तक आरोपियों ने उन्हें खाता नंबर तक नहीं दिया। वीडियो कॉल के जरिए पहले यह पुष्टि की गई कि पीड़ित बैंक पहुंच चुका है। इसके बाद WhatsApp पर बैंक खाता नंबर भेजा गया और उनसे 17.75 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए।

रकम वापस दिलाने के नाम पर फिर मांगे पैसे

ठगी की रकम ट्रांसफर होने के बाद भी साइबर अपराधी नहीं रुके। आरोपियों ने पीड़ित से कहा कि रकम वापस पाने के लिए उन्हें तीन लाख रुपये और जमा करने होंगे। यहीं से कुंदन सिंह को शक हुआ। उन्होंने तुरंत अपने परिजनों को पूरे मामले की जानकारी दी, जिसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं।

पुलिस ने शुरू की जांच

पीड़ित की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। डीसीपी पश्चिमी जोन आदित्य सिंह (Aditya Singh) ने बताया कि जिन खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए हैं, उनकी जांच की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि बैंक खाते किन लोगों के नाम पर खोले गए और उनका इस्तेमाल किन गतिविधियों में किया गया। फिलहाल आरोपियों की तलाश जारी है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ सिर्फ ठगी का तरीका

डीसीपी ने लोगों को सतर्क करते हुए कहा कि साइबर अपराधी अब डिजिटल अरेस्ट, टेरर फंडिंग और जांच एजेंसियों के नाम का इस्तेमाल कर लोगों को डरा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कानूनी रूप से “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई व्यवस्था नहीं होती। यह सिर्फ लोगों को डराकर पैसे ऐंठने का नया तरीका है।

पुलिस ने जारी की एडवाइजरी

पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, वीडियो कॉल या संदेश पर तुरंत भरोसा न करें। यदि कोई खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य एजेंसी का अधिकारी बताकर पैसे मांगता है, तो तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर सेल से संपर्क करें। इसके अलावा किसी भी दबाव में आकर बैंक डिटेल, ओटीपी या रकम ट्रांसफर न करें। साइबर ठगी होने पर तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

आगरा में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी शिक्षक, डॉक्टर और कारोबारी जैसे कई लोग इस तरह के साइबर अपराध का शिकार हो चुके हैं। कुछ मामलों में पीड़ितों से लाखों रुपये की ठगी की जा चुकी है। हालांकि पुलिस एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करती है, लेकिन साइबर अपराधियों तक पहुंचना और रकम वापस दिलाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित होता है।