आगरा

आपने कभी आस-पास या पड़ौस में बेटी के जन्म पर ढोल नगाड़े या शहनाईयां बजते देखा है, क्यों…

आर्मी हाॅस्पिटल में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने महिला सशक्तिकरण और बेटी बचाओ-बेटी पढाओ पर रखे विचार
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Updated: 22 May 2018, 7:17 PM IST
Dr. Narender Malhotra
Dr. Narender Malhotra

आगरा। आपने कभी आस-पास या पड़ौस में बेटी के जन्म पर ढोल नगाड़े या शहनाईयां बजते देखा है? शायद नहीं देखा होगा। हम भारत के लोग 21वीं शताब्दी के भारतीय होने का गर्व करते हैं, बेटा पैदा होने पर जश्न मनाते हैं और बेटी का जन्म हो तो शांत हो जाते हैं। या तो हम लड़की को जन्म से पहले ही मार देते हैं और अगर वो नहीं मारी जाती तो जीवन भर उनके साथ भेदभाव के तरीके ढूंढ लेते हैं। जहां तक महिलाओं के साथ हमारे दृष्टिकोण का सवाल है तो हमारा समाज दोहरे मानकों पर चलता आ रहा है, जहां हमारे विचार और उपदेश हमारे कार्यों से भिन्न हैं। यह विचार देश के ख्याति प्राप्त गायनेकोलाॅजिस्ट डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने सैन्य कर्मचारियों और उनके परिवारीजनों के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में प्रस्तुत किए।

यहां हुआ आयोजन
आर्मी हाॅस्पिटल की ओर से सैन्य क्षेत्र स्थित उस्मान आॅडिटोरियम में आगरा स्टेशन के सैन्य कर्मचारियों और उनके परिवारीजनों के लिए महिला सशक्तिकरण और उनके अधिकार पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें बतौर मुख्य वक्ता महिला स्वास्थ्य, सम्मान और सशक्तिकरण पर पिछले काफी समय से काम कर रहे डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा ने कहा कि साल 2008 में बेटी बचाओ, बेटी पढाओ... के बाद पंख दो परवाज दो, नारी को आकाश दो... के नारे के साथ देश के स्त्री रोग विशेषज्ञों के सबसे बडे संगठन फाॅग्सी ने एक बार फिर अपनी आवाज बुलंद की है। इस साल फाॅग्सी का मकसद देश में नारी के महत्व को रेखांकित करते हुए यह बताना भी होगा कि अगर स्त्री को उचित देखभाल और शिक्षा मिले तो वो समाज और देश में तमाम सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

नारी अबला नहीं...
उन्होंने कहा कि भारत की अनेकों नारियों ने समय-समय पर सिद्ध किया है कि वह अबला नहीं हैं। केवल जननी नहीं ज्वाला हैं। वो नाम जो कल झांसी की रानी था, आज देश की पहली डिफेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण, इंटर सर्विस गार्ड आॅफ आॅनर को नेतृत्व करने वालीं पहली भारतीय वायुसेना विंग की कमांडर पूजा ठाकुर या फिर भारतीय वायुसेना में फाइटर प्लेन मिग 21 उडाने वालीं अवनी चतुर्वेदी है। दुनिया भर में आज महिलाएं अपना परचम लहरा रही हैं। इतना ही नहीं भारत में 60 प्रतिशत महिलाएं पुरूषों की तरह ही और अफ्रीका में 84 प्रतिशत महिलाएं खेतीबाडी में सहयोग दे रही हैं। 90 प्रतिशत महिलाएं घर के कामकाज संभालती हैं। पूरे विश्व में हर 10 में से चार घरों में सिर्फ महिलाएं ही अपनी जीविका से परिवार का भरण-पोषण करती हैं। जबकि वेतन की बात आती है तो हम पुरूषों की तुलना में महिलाओं को उसी काम के लिए समान वेतन नहीं देना चाहते। यह हालात तब हैं जब महिलाएं अपने काम के प्रति अधिक समर्पित और ईमानदार भी हैं।

क्यों है ये भेदभाव
समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति को देखते हुए कुछ कारणों में गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएं घरों में कम वेतन पर घरेलू काम करने, कई प्रवासी मजदूरों के रूप में काम करने को मजबूर हो जाती हैं। महिलाओं का न केवल असमान वेतन दिया जाता है बल्कि उनके लिए कम कौशल की नौकरियां पेश की जाती हैं, जिनका वेतनमान बहुत कम होता है। यह ***** के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है। लडकी को बचपन से शिक्षित करना आज भी एक बुरा निवेश माना जाता है। क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोडकर दूसरे घर जाना होगा। महिलाओं को खाने के लिए वही मिलता है जो परिवार के पुरूषों के खाने के बाद बच जाता है। अतः समुचित और पौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाएं कई तरह के रोगों का शिकार हो जाती हैं। इसलिए जब तक लोग मानसिक तौर पर नारी का सम्मान नहीं करेंगे, नारी शक्ति को अहमियत नहीं देंगे, तब तक देश का सर्वपक्षीय विकास संभव नहीं है।

"अदभुत मातृत्व" के बारे में दी जानकारी....
समारोह में डॉ. जयदीप और डॉ. नरेंद्र ने सैन्य कर्मचारियों और उनके परिवारों को फाॅग्सी और उसके नए काॅन्सेप्ट अदभुत मातृत्व के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि छह जनवरी 1950 को मद्रास (अब चेन्नई) में गठित हुई फाॅग्सी की 223 सदस्य संस्थाएं और 34000 व्यक्तिगत सदस्य देश की महिलाओं एवं बच्चों के स्वास्थ्य सुधार के लिए निरंतर कार्यक्रम चला रहे हैं। फाॅग्सी मुख्य रूप से स्त्र्ाी एवं प्रसूति रोगों से बचाव एवं उनके समुचित इलाज के लिए कार्य करती है। लेकिन अब यह दायरा भी निरंतर बढता है। महिलाओं के हक, उनके स्वास्थ, सुरक्षा और सशक्तिकरण के साथ ही उनसे जुडे हर मुददे पर फाॅग्सी आगे आ रही है। दोनों ही प्रख्यात चिकित्सकों ने कहा कि बतौर चिकित्सक महिलाओं के बीच उनका अनुभव हर दिन बेहतर होता रहा है। यह और रोमांचक हो रहा है। इस बार हमने अपने साथ एक नए अध्याय के रूप में अदभुत मातृत्व के कांसेप्ट को जोडा है। इसमें देश भर में एक अभियान चलाकर गर्भवती महिलाओं, दंपति और उनके परिवारों को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि बच्चा जब गर्भ में होता है तो किस तरह उसके अंदर अच्छे स्वास्थ्य और संस्कारों का सृजन किया जा सकता है।

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