
आगरा. प्रेम पाना और प्रेम जताना है तो आपकी खोज 'यह सदी निरुत्तर है' पर पूरी हो सकती है। मोहनलाल विश्वविद्यालय उदयपुर में पत्रकारिता और जनसंचार के विभागाध्यक्ष व जाने माने कवि डॉ कुंजन आचार्य का बोधि प्रकाशन जयपुर से दूसरा कविता संग्रह आ गया है। उनकी कविता के इन शब्दों पर जरा गौर फरमाएं: ठोस हो गई/जम गई तरलता/ और संवेगशून्यता के बीच/ फीके पड़ गए शब्दों में चमक भरने के लिए/अब तुम्हीं बताओ क्या किया जाय? ये शब्द ही बता देते हैं कि 'यह सदी निरुत्तर है' की कविताएँ प्रेम के द्वंद्व की कविताएँ हैं!
मृत्यु में आशा का चमत्कार
डॉ आचार्य ने यह संग्रह अपने स्वर्गीय दादा-दादी और स्मृति शेष अनुज दिलीप(राजा)के साथ ही अपने माता-पिता,जीवन सहचरी कल्पना और पुत्र गर्वित एवं कुशिक को समर्पित किया है। इस बारे में जाने समालोचक लेखक सवाई सिंह शेखावत कहते हैं कि मृत्यु में आशा का लेखन देखना है तो मृत्यु-कथन' कविता में खोज जाएं। कवि अपने अनुज दिलीप(राजा)की अशेष स्मृति में जाकर भी निराश नहीं होता। बल्कि राजा के किसी नए रंग में जीने की बात करते हुए कहता है कि :मृत्यु मात्र अहसास है/मंदिर से मूर्ति हो जाने पर भी/झूलते रहने वाले उस छत्र का/दरअसल वह तो पायदान है /जिस पर पैर रखकर /मुझे घर से बाहर निकलना है/घूम आने के लिए। यूँ उन्हें यह भी मालूम है 'जीवन के अंधेरे और प्रकाश के बीच कहीं मौजूद हैं हम'।
क्यों कि मैं प्रेम करता हूँ
मूर्धन्य कवि लीलाधर जगूड़ी ने फ्लैप में लिखा है कि 'कवि कुंदन आचार्य जीवन की ज़रूरी आत्मीय संवेदना को बचाने की कारगर पैरोकारी करते हैं। अपनी कविताओं के मार्फ़त वे प्रकृति,परिवेश व मानवीय रिश्तों में आ रही लगातार छीजत की पड़ताल ही नहीं करते,बल्कि यह सवाल भी पूछते चलते हैं कि : इस जीवन विरोधी संवादहीनता को तोड़ने की कोशिश में वे अपने कवि-संकल्प को भी दुहराते हैं : मैं सब कुछ इसलिए सहन कर सकता हूँ/क्यों कि मैं प्रेम करता हूँ!
मिल चुका है सुमनेश जोशी सम्मान
पत्रिका से विशेष बातचीत में डॉ आचार्य ने बताया कि वर्ष 1999 में उनका पहला कविता-संग्रह 'एक टुकड़ा आसमान' प्रकाशित हुआ था-जो काफ़ी चर्चित रहने के साथ ही राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से 'सुमनेश जोशी सम्मान' से भी नवाज़ा गया था। कवि कहता है कि जीवन में इन छोटी-छोटी सी दिखती बातों का बड़ा महत्व है। रिश्तों की ईमानदारी के प्रश्न को लेकर कवि का मानना है कि 'वाक़ई, किसी सबंध को चिरन्तनता देने के लिए हमें उसे जीना पड़ता है/पूरी संजीदगी के साथ।यहाँ निभाने और जीने के फ़र्क को हमें ठीक से समझना होगा।इस मर्म में पैंठते हुए ही कवि आँख व मन से जुड़ी जीवन संवेदना से लबरेज़ होकर बहुत दिनों बाद एक कविता लिख कर ताज़ा दम होता है।