
ahmedabad: जिनके पास अपना कहने वाला कोई नहीं, जिनकी कलाई पर राखी बांधने के लिए न बहन है और न भाई... ऐसे करीब 60 लावारिस मरीजों के लिए अहमदाबाद का सिविल अस्पताल ही उनका घर और कर्मचारी ही परिजन बने।
रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व गुरुवार को इन मरीजों ने अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों को राखी बांधी और बंधवाकर अपनेपन का रिश्ता जोड़ा। अस्पताल के कर्मचारियों ने भी इन मरीजों की भावनाओं को समझते हुए उन्हें परिवार के सदस्य की तरह अपनाया और उनके साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाया।।
सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी ने बताया कि अस्पताल में हमेशा करीब 60 ऐसे मरीज रहते हैं, जिनका अपना कोई यहां नहीं होता। वर्तमान में करीब 12 लावारिस महिला मरीज और 45 से अधिक पुरुष मरीज अस्पताल में उपचाराधीन हैं। इन मरीजों की देखभाल भी अस्पताल का स्टाफ अपनों की तरह करता है। रक्षाबंधन पर इन्हीं भावनाओं को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से उनके साथ यह पर्व मनाया गया।
डॉ. जोशी ने बताया कि अस्पताल के लावारिस महिला मरीजों के साथ भी रक्षाबंधन मनाया गया। वहीं पुरुष मरीजों ने अस्पताल की महिला अधीक्षक और नर्सिंग स्टाफ को राखी बांधी। डॉक्टरों और कर्मचारियों ने इन मरीजों के साथ समय बिताया और मिठाई भी वितरित की। जिन मरीजों के जीवन में अपने परिवार की कमी है, उनके लिए राखी का यह छोटा-सा धागा अपनत्व का बड़ा सहारा बन गया।
अस्पताल का स्टाफ उनके सुख-दुख में उनके साथ है। कुछ समय के लिए अस्पताल का माहौल भी ऐसा हो गया, जैसे मरीज अपने ही परिवार के बीच रक्षाबंधन मना रहे हों। मरीजों का उपचार करना अस्पताल की जिम्मेदारी है, लेकिन उनके मन की भावनाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है। रक्षाबंधन के इस आयोजन का उद्देश्य ऐसे मरीजों को यह अहसास कराना था कि वे अकेले नहीं हैं।
करुणा मैत्री समूह से जुड़े जैन समाज के युवक-युवतियों ने भी सिविल अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकों और अस्पताल के अधिकारियों के साथ रक्षाबंधन मनाया। उन्होंने डॉ. चिराग पटेल, डॉ. जस्मीन दीवान, डॉ. पीयूष मित्तल, डॉ. प्रशांत मेहता, डॉ. संजय कापड़िया सहित चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी को राखी बांधी। समूह की ओर से समाज के लिए सेवा कार्य करने वाले चिकित्सकों और अस्पतालकर्मियों के प्रति सम्मान जताते हुए रक्षाबंधन मनाया गया। डॉ. जोशी ने कहा कि रक्षाबंधन का यह आयोजन केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उन मरीजों को अपनत्व देने का प्रयास है, जिनका इस दुनिया में अपना कहने वाला कोई नहीं है। रिश्ते खून से ही बनें, यह जरूरी नहीं है, कई बार संवेदना और साथ का एक छोटा-सा धागा भी परिवार का एहसास करा देता है।