अहमदाबाद विमान हादसे की पहली बरसी पर एशिया के सबसे बड़े सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी उस दिन को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि हादसे के बाद अस्पताल में सिर्फ सायरनों की आवाज, अपनों की तलाश में भटकते परिजन और चारों तरफ गूंजती चीत्कारें ही सुनाई दे रही थीं। सबसे पीड़ादायक स्थिति यह थी कि कई मृतकों के शव इतने क्षतिग्रस्त हो गए थे कि उनकी पहचान करना भी संभव नहीं था। डीएनए जांच के जरिए उनकी पहचान कर सम्मानपूर्वक परिजनों को सौंपना अस्पताल और एफएसएल टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।

अहमदाबाद कोरोना में हजारों लोगों की मौत देखी, बम विस्फोट के घायलों का भी उपचार किया, लेकिन विमान हादसे के बाद जो दृश्य सिविल अस्पताल में देखा, वैसी भयावह स्थिति जीवन में कभी नहीं देखी। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि ऐसी त्रासदी फिर कभी देखने को न मिले।अहमदाबाद विमान हादसे की पहली बरसी पर एशिया के सबसे बड़े सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी उस दिन को याद करते हुए भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि हादसे के बाद अस्पताल में सिर्फ सायरनों की आवाज, अपनों की तलाश में भटकते परिजन और चारों तरफ गूंजती चीत्कारें ही सुनाई दे रही थीं। सबसे पीड़ादायक स्थिति यह थी कि कई मृतकों के शव इतने क्षतिग्रस्त हो गए थे कि उनकी पहचान करना भी संभव नहीं था। डीएनए जांच के जरिए उनकी पहचान कर सम्मानपूर्वक परिजनों को सौंपना अस्पताल और एफएसएल टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।
डॉ. जोशी बताते हैं कि दुर्घटना के समय वे एक बच्चे की छह से आठ घंटे चलने वाली जटिल ब्लैडर एक्स्ट्रॉफी सर्जरी में व्यस्त थे। हादसे की सूचना मिलते ही ऑपरेशन सहयोगी चिकित्सक को सौंपकर सीधे ट्रॉमा सेंटर पहुंच गए। वहां का दृश्य देखकर कुछ पल के लिए वे भी स्तब्ध रह गए। उनके अनुसार यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे अस्पताल परिवार का संघर्ष था। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, वार्ड बॉय, सफाई कर्मचारी और प्रशासनिक अमला लगातार कई घंटों तक बिना रुके काम करता रहा। सरकार और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और स्पष्ट निर्देश दिए कि किसी भी परिजन की भावनाओं को ठेस न पहुंचे तथा हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जाए।
डॉ. जोशी कहते हैं कि कोरोना काल और बम विस्फोट जैसी आपदाओं में भी उन्होंने काम किया है, लेकिन यह हादसा अलग था। यहां चुनौती केवल घायलों का उपचार नहीं थी, बल्कि उन लोगों की पहचान करना भी था जिनके शरीर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके थे। कई मामलों में शरीर के अंगों का मिलान करना तक मुश्किल हो रहा था। बावजूद इसके, एफएसएल, अस्पताल प्रशासन और विभिन्न एजेंसियों के समन्वित प्रयासों से अधिकांश शवों की पहचान कर उन्हें सम्मान के साथ परिजनों को सौंपा गया।