अहमदाबाद

Ahemdabad: सरसपुर की पोलों-शेरियों में अतिथि सत्कार , करीब दो लाख श्रद्धालुओं ने ग्रहण किया प्रसाद

सरसपुर की करीब दस पोलों और शेरियों में अतिथि सत्कार देखते ही बन रहा था। जैसे-जैसे भगवान के रथ के सरसपुर पहुंचने का समय नजदीक आता गया, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं की भीड़ भी बढ़ती गई। रथ गुजरने के बाद तो हर पोल और शेरी में प्रसाद पाने वालों की लंबी कतारें लग गईं। विशेष बात यह रही कि यहां किसी प्रकार की अफरा-तफरी या जल्दबाजी देखने को नहीं मिली।
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रथयात्रा के दौरान सरसपुर में भोजन करते श्रद्धालु।

Ahmedabad. भगवान जगन्नाथ की 149वीं रथयात्रा के दौरान सरसपुर की संकरी पोलों और शेरियों में गुरुवार को आस्था, सेवा और समर्पण का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने हर किसी को भावविभोर कर दिया। भगवान के ननिहाल के रूप में प्रसिद्ध सरसपुर में अतिथियों के स्वागत के लिए सुबह से ही भंडारों की तैयारियां शुरू हो गई थीं। दोपहर दो बजे तक यहां अनुमानित डेढ़ से दो लाख श्रद्धालुओं ने यहां प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण किया। उमसभरी गर्मी के बावजूद लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था। आत्मीयता के साथ प्रत्येक श्रद्धालु से आग्रह कर भोजन कराया जा रहा था। सेवा का यह भाव केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं था। शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए युवा, सामाजिक संगठन और श्रद्धालु भी प्रसाद वितरण, पानी पिलाने, कतारों की व्यवस्था और साफ-सफाई में पूरे समर्पण के साथ जुटे रहे।

पूरे वर्ष इस दिन की रहती है प्रतीक्षा

कडियावाड पोल में भंडारे की व्यवस्था संभाल रहे गिरीश सुथार ने बताया कि उनके यहां ही करीब 10 से 12 हजार श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 35 वर्षों से रथयात्रा के दिन खिचड़ी और सब्जी का प्रसाद परोसने की परंपरा निभाई जा रही है। उनके अनुसार यह केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि भगवान की सेवा का माध्यम है और पूरे वर्ष लोग इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं। इसी पोल के निवासी राजेंद्रसिंह वाघेला ने कहा कि यहां आने वाले लोग भोजन करने नहीं, बल्कि भगवान का प्रसाद पाने आते हैं। यही कारण है कि कई बार घंटों कतार में इंतजार करने के बाद भी किसी के चेहरे पर अधीरता नहीं दिखती। प्रसाद ग्रहण करने के बाद श्रद्धालुओं के चेहरे पर जो संतोष दिखाई देता है, वही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता है।

लुहार शेरी में श्रद्धालुओं के लिए पूरी-सब्जी और मोहनथाल का प्रसाद तैयार किया गया था। वहीं ननी वासणशेरी में पूड़ी, सब्जी, बूंदी और चावल परोसे गए। अलग-अलग पोलों और शेरियों में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार अलग-अलग प्रकार के प्रसाद बनाए गए, ताकि ननिहाल आने वाले भगवान के भक्तों का प्रेमपूर्वक सत्कार किया जा सके।

प्रसाद ही नहीं छाछ, पानी और शरबत की भी व्यवस्था

पूरे सरसपुर में बच्चे, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में मौजूद रहे। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में भजन और लोकगीत गाती नजर आईं, जबकि बच्चे भगवान के रथ की एक झलक पाने को उत्साहित दिखाई दिए। कई परिवार सुबह से ही अपने घरों के बाहर श्रद्धालुओं के लिए ठंडे पानी, छाछ और पेयजल की व्यवस्था करते रहे। पोलों में जगह-जगह स्वयंसेवक लोगों को बैठने का स्थान दिखा रहे थे और बुजुर्गों की सहायता कर रहे थे।समरसता और लोक भागीदारी का भी अद्भुत उदाहरण

रथयात्रा के दौरान सरसपुर में दिखाई दिया यह सेवा भाव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और लोक भागीदारी का भी अद्भुत उदाहरण बन गया। यहां प्रसाद की एक-एक पत्तल में केवल भोजन नहीं, बल्कि भगवान के प्रति श्रद्धा, ननिहाल का अपनापन और सेवा की भारतीय परंपरा का सजीव दर्शन हुआ।

Updated on:
16 Jul 2026 10:31 pm
Published on:
16 Jul 2026 10:30 pm