अहमदाबाद

भावनगर का ध्रिशिव वकाणी बना सुपर जीनियस, 9 महीने की उम्र में महान व्यक्तियों, पेड़ों, सब्जी-फल की पहचान

राजकोट/भावनगर. गुजरात के भावनगर शहर में मात्र 9 महीने के एक बच्चे ने अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता से लोगों को चौंका दिया है। ध्रिशिव वकाणी नाम का यह बच्चा इतनी छोटी उम्र में महान व्यक्तियों, सब्जियों, फलों, रंगों, शरीर के अंगों, पेड़ों की पहचान कर लेता है। सोशल मीडिया पर उसके वीडियो वायरल होने के बाद लोग उसे “सुपर चाइल्ड” और “सुपर जीनियस” कहकर बुला रहे हैं।

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पिता डॉ. चिराग व माता मित्तलबेन के साथ ध्रिशिव वकाणी।

असाधारण प्रतिभा के पीछे आयुर्वेदिक पंचकर्म-गर्भ संस्कार का दावा - पिता आयुर्वेद प्रैक्टिशनर, माता फार्मासिस्ट

राजकोट/भावनगर. गुजरात के भावनगर शहर में मात्र 9 महीने के एक बच्चे ने अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता से लोगों को चौंका दिया है। ध्रिशिव वकाणी नाम का यह बच्चा इतनी छोटी उम्र में महान व्यक्तियों, सब्जियों, फलों, रंगों, शरीर के अंगों, पेड़ों की पहचान कर लेता है। सोशल मीडिया पर उसके वीडियो वायरल होने के बाद लोग उसे “सुपर चाइल्ड” और “सुपर जीनियस” कहकर बुला रहे हैं।
ध्रिशिव के पिता डॉ. चिराग वकाणी एक प्रसिद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं, जबकि मां मित्तलबेन वकाणी फार्मासिस्ट हैं। उनका दावा है कि बच्चे की यह अद्भुत क्षमता भारतीय आयुर्वेद, पंचकर्म और गर्भ संस्कार का परिणाम है। उनका कहना है कि ध्रिशिव के जन्म से पहले आयुर्वेदिक विधि से पंचकर्म कराया गया और उचित समय व संस्कारों के अनुसार गर्भाधान प्रक्रिया अपनाई गई। गर्भावस्था के दौरान मां ने सात्विक आहार, सकारात्मक सोच, मंत्रोच्चार और मानसिक शांति को जीवन का हिस्सा बनाया।
सामान्यतः नौ महीने का बच्चा केवल माता-पिता को पहचानना सीखता है, लेकिन ध्रिशिव फ्लैश कार्ड्स के जरिए पूछे गए सवालों के सही जवाब संकेतों से दे देता है। बैंगन, गाजर, फूलगोभी, चावल जैसे खाद्य पदार्थों से लेकर रंगों और शरीर के अंगों तक की पहचान वह आसानी से कर लेता है। ध्रिशिव केवल खाद्य पदार्थ ही नहीं, बल्कि देश-विदेश के महान व्यक्तियों, विभिन्न प्रकार के वृक्षों और प्राकृतिक चीजों को भी आसानी से पहचान लेता है। उसकी तेज स्मरण शक्ति और एकाग्रता देखकर लोग हैरान रह जाते हैं।
डॉ. चिराग वकाणी का कहना है कि गर्भ संस्कार केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के मस्तिष्क विकास से जुड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। उनके अनुसार मां का खान-पान, विचार और वातावरण बच्चे की बुद्धि क्षमता पर गहरा प्रभाव डालता है। मित्तलबेन ने भी बताया कि गर्भावस्था के दौरान वे बच्चे से लगातार संवाद करती थीं, जिसे आयुर्वेद में “गर्भ संवाद” कहा जाता है।

मेडिकल साइंस और आयुर्वेद का अद्भुत संगम : माता

फार्मेसी क्षेत्र से जुड़ी होने के बावजूद मित्तलबेन वकाणी ने एलोपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद के सिद्धांतों को भी अपने जीवन में अपनाया। उन्होंने बताया कि जब ध्रिशिव गर्भ में था, तभी से वे उससे संवाद करती थीं, जिसे आयुर्वेद में गर्भ संवाद कहा जाता है। बच्चे के जन्म के बाद भी उसके आसपास ऐसा वातावरण बनाया गया जिससे उसके मस्तिष्क के विकास को प्रोत्साहन मिले।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि हर बच्चा अलग तरीके से विकसित होता है और शुरुआती प्रतिभा भविष्य की बुद्धिमत्ता का अंतिम पैमाना नहीं होती, फिर भी ध्रिशिव की क्षमताओं ने लोगों में आयुर्वेद और गर्भ संस्कार को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। यह मामला आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय परंपरा के संगम का अनोखा उदाहरण बन गया है।

Published on:
24 May 2026 10:12 pm
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