बढ़ती मांग और दाम के बीच कारीगरों की दिन-रात की जद्दोजहद
Ahmedabad :उत्तरायण पर्व में पतंगों का जुनून सर्वविदित है। पतंग को आसमां में ऊंचाई देने के लिए धारदार डोरी (मांझे) की रंगाई इन दिनों अहमदाबाद समेत पूरे राज्य में जोरों पर है।इलाहाबाद, कानपुर, जयपुर और बीकानेर समेत विविध भागों से आए रंगरेज महीनों से यहां डेरा जमाए हुए हैं। दीपावली के बाद से ही वे डोर रंगने में जुटे हुए हैं। इन दिनों कारीगर इस हालत में हैं कि डोरी में धार देते-देते उनकी उंगलियां भी जगह-जगह से कट गई हैं। पट्टी बांध कर रंगाई में जुए कारीगर बढ़ती मांग और दाम के बीच दिन रात की जद्दोजहद कर रहे हैं। जैसे-जैसे पर्व नज़दीक आया है वैसे-वैसे उनकी मेहनत और ग्राहकों की कतारें बढ़ती जाती हैं। रंगाई के दाम भी 80 फीसदी तक बढ़ गए हैं।
दिल्ली निवासी इरशाद का कहना है कि जब वे यहां आए थे तब प्रति हजार वार डोर रंगने का भाव 50 से 60 रुपए था। ढाई माह बाद यह भाव 100 रुपए हो गया है। इसके बावजूद ग्राहकों की भीड़ कम नहीं हुई है। वे अपने नौ अन्य साथियों को भी साथ लाए हैं। कानपुर निवासी मोहम्मद कहते हैं कि वे वर्षों से घिसाई की प्रक्रिया से डोर रंगते हैं, जिससे मांझा मजबूत बनता है। अब उत्तरायण पर्व बिल्कुल निकट आ गया है ऐसे में कारीगर सुबह से लेकर देर रात तक रंगाई के काम में जुटे हुए हैं। उन्हें अब बात करने की भी फुर्सत नहीं हैं। डोरी रंगते-रंगते कारीगरों की जगह-जगह से हाथों की उंगलियां भी कटी हुई हैं, इसके बावजूद वे पट्टी बांध कर दिन-रात लगे हुए हैं।
अहमदाबाद के सरसपुर क्षेत्र में अपने नौ कारीगरों के साथ पतंग रंगने करीब डेढ़ माह पूर्व आए राजस्थान के जयपुर निवासी नूर अहमद ने बताया कि अब कम समय रह गया है इसलिए वे दिन रात डोर रंगने में लगे हुए हैं। इन दिनों कारीगर भी थक गए हैं। इसके बावजूद सुबह से रात तक काम कर रहे हैं। हाल में डोर को धार देने की एवज में उनके यहां भी 100 रुपए की रेट चल रही है। जब वे आए थे तब 60 रुपए भाव था। रंगाई का यह काम आसान नहीं है। वे कांच, सुहागा और रंग के मिश्रण से डोर को धारदार बनाते हैं। यही कारण है कि ग्राहकों को उनकी रंगाई पसंद आती है। शहर के कालूपुर, रायपुर, बेहरामपुरा, जमालपुर, सरसपुर, चांदखेड़ा और शाहीबाग जैसे इलाकों में इन दिनों मांझा रंगाई का काम तेजी पर है।
डोर की रंगाई का पहला तरीका घिसाई कर रंगना है। यह प्रक्रिया मेहनत भरी और मजबूत मांझा तैयार करती है। इसके भाव ज्यादा हैं। जबकि दूसरा तरीका लपेट कर रंगाई करना है। चरखे की तरह डोर को लपेटकर रंगा जाता है। यह अपेक्षाकृत आसान तरीका है। इसके भाव घिसाई की तुलना में कम हैं।